पद्यांश: मुझे फूल मत मारो
मैं अबला बाला वियोगिनी कुछ तो दया विचारो
होकर मधु के मीत मदन, पटु तुम कटु गरल न गारो
मुझे विकलता तुम्हें विफलता, ठहरो, श्रम परिहारो
नहीं भोगिनी यह मैं कोई, जो तुम जाल पसारो
बल हो तो सिंदूर-बिन्दु यह-यह हरनेत्र निहारो।
रूप-दर्प कंदर्प, तुम्हें तो मेरे पति पर बारो,
लो यह मेरी चरण धूलि, उस रति के सिर पर धारो।
(iv) “मैं अबला बाला वियोगिनी, कुछ तो दया विचारो” पंक्ति में कौन-सा रस प्रयुक्त है?