चरण 1: प्रसंग:
यहाँ लेखक राष्ट्र के भौतिक स्वरूप के निर्माण की चर्चा कर रहे हैं। वे कहते हैं कि राष्ट्र की उन्नति के लिए ज्ञान और कर्म का मेल आवश्यक है।
चरण 2: शब्दार्थ:
उद्यम = प्रयत्न, कर्म। भौतिक स्वरूप = सांसारिक, बाहरी रूप (धन, साधन, सुविधाएँ)। ठाट खड़ा करना = ढाँचा तैयार करना। अथक = जो थके नहीं। नित्य = प्रतिदिन।
चरण 3: व्याख्या:
लेखक का कहना है कि केवल विज्ञान से या केवल परिश्रम से राष्ट्र आगे नहीं बढ़ता। दोनों को साथ लेने पर ही राष्ट्र के साधन, उद्योग, कृषि और सुख-सुविधाओं का मजबूत ढाँचा बनता है। यह निर्माण एक दिन का काम नहीं है। इसे प्रसन्न मन, उमंग और बिना थके मेहनत से रोज़ आगे बढ़ाना होगा। निराशा या आलस्य से यह काम नहीं हो सकता।
चरण 4: टिप्पणी:
भाषा सरल है, तत्सम शब्दों का प्रयोग है और भाव प्रेरणा देने वाला है।
निष्कर्ष:
राष्ट्र की भौतिक प्रगति विज्ञान, उद्यम, उत्साह और सतत परिश्रम के मेल से ही सम्भव है।