Question:

निम्नलिखित काव्यांशों में से किसी एक काव्यांश की लगभग 100 शब्दों में सप्रसंग व्याख्या कीजिए: कुछ दिन रह गृह तू फिर समोद, बैठी नानी की स्नेह-गोद। मामा-मामी का रहा प्यार, भर जलद धरा को ज्यों अपार; वे ही सुख-दुख में रहे न्यस्त, तेरे हित सदा समस्त, व्यस्त; वह लता वहीं की, जहाँ कली तू खिली, स्नेह से हिली, पली, अंत भी उसी गोद में शरण ली, मूँदे दृग वर महामरण !

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यह सरोज स्मृति का अंश है। सरोज के ननिहाल के स्नेह और वहीं हुए उसके अंत की व्याख्या करें।
Updated On: Oct 21, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: प्रश्न का स्वरूप:
दिया गया काव्यांश निराला की 'सरोज स्मृति' से है। इसकी लगभग 100 शब्दों में सप्रसंग व्याख्या करनी है।

चरण 2: प्रसंग:
सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' ने यह शोकगीत अपनी पुत्री सरोज की मृत्यु पर लिखा है। इस अंश में कवि सरोज के ननिहाल में बीते जीवन और अंत को याद करता है।

चरण 3: व्याख्या:
कवि कहता है कि सरोज कुछ दिन घर में प्रसन्नता से रहकर फिर अपनी नानी की स्नेहभरी गोद में जा बैठी। वहाँ मामा-मामी का प्यार उस पर बादलों की तरह धरती पर बरसता रहा। वे सुख-दुख में सदा उसके साथ रहे और उसकी भलाई के लिए हमेशा लगे रहे। वह उसी स्थान की लता थी, जहाँ वह कली की तरह खिली, प्यार से हिलती-डुलती पली-बढ़ी। अंत में भी उसने उसी गोद में आश्रय लिया और शांति से आँखें मूँदकर महामरण को प्राप्त हुई।

चरण 4: विशेष:
1. 'भर जलद धरा को ज्यों अपार' में उपमा अलंकार है।
2. सरोज को लता और कली कहना रूपक है।
3. भाषा तत्सम-प्रधान है और करुण रस है।

अंतिम उत्तर:
काव्यांश में सरोज के ननिहाल से जुड़े स्नेह और उसके वहीं प्राण त्यागने का करुण चित्र है।
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