Question:

निम्नलिखित काव्यांशों में से किसी एक काव्यांश की लगभग 100 शब्दों में सप्रसंग व्याख्या कीजिए: मुझ भाग्यहीन की तू संबल युग वर्ष बाद जब हुई विकल, दुख ही जीवन की कथा रही क्या कहूँ आज, जो नहीं कही ! हो इसी कर्म पर वज्रपात यदि धर्म, रहे नत सदा माथ इस पथ पर, मेरे कार्य सकल हों भ्रष्ट शीत के-से शतदल ! कन्ये, गत कर्मों का अर्पण कर, करता मैं तेरा तर्पण !

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पहले 'सरोज स्मृति' का प्रसंग लिखें, फिर पंक्तियों का भाव, अंत में करुण रस और उपमा अलंकार।
Updated On: Oct 21, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: व्याख्या की रूपरेखा:
सप्रसंग व्याख्या में पहले प्रसंग (कवि, कविता और स्थिति) लिखा जाता है, फिर काव्यांश की व्याख्या और अंत में विशेष बातें। उत्तर लगभग 100 शब्दों में होना चाहिए।

चरण 2: प्रसंग:
ये पंक्तियाँ सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की कविता 'सरोज स्मृति' से ली गई हैं। यह कविता कवि ने अपनी युवा पुत्री सरोज की मृत्यु के बाद उसकी स्मृति में लिखी है। इन पंक्तियों में पिता अपना दुख और अपना संकल्प व्यक्त करता है।

चरण 3: व्याख्या:
कवि पुत्री से कहता है कि तू मुझ भाग्यहीन का सहारा थी। मेरे जीवन की पूरी कथा दुख की रही है, जिसे मैं आज तक पूरी तरह कह नहीं पाया। वह कहता है कि यदि धर्म के इस मार्ग पर चलते हुए मेरे कर्मों पर वज्रपात भी हो जाए, तब भी मेरा सिर धर्म के आगे झुका रहेगा। मेरे सारे कार्य शीत ऋतु के कमलों की तरह नष्ट हो जाएँ, चिंता नहीं। हे पुत्री, मैं अपने बीते हुए सभी कर्म तुझे अर्पित करके तेरा तर्पण करता हूँ।

चरण 4: विशेष:
इसमें करुण रस है। 'शीत के-से शतदल' में उपमा अलंकार है। भाषा तत्सम प्रधान और भाव गहरे हैं।

अंतिम उत्तर:
कवि पिता के रूप में अपने सभी कर्म पुत्री को अर्पित करके श्रद्धांजलि देता है और अपने कर्तव्य-पथ पर अडिग रहने का संकल्प करता है।
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