Question:

निम्नलिखित काव्यांशों में से किसी एक काव्यांश की लगभग 100 शब्दों में सप्रसंग व्याख्या कीजिए: शृंगार, रहा जो निराकार, रस कविता में उच्छ्वसित-धार गाया स्वर्गीया-प्रिया-संग - भरता प्राणों में राग रंग, रति-रूप प्राप्त कर रहा वही, आकाश बदल कर बना मही। हो गया ब्याह, आत्मीय स्वजन, कोई थे नहीं, न आमंत्रण था भेजा गया, विवाह-राग भर रहा न घर निशि-दिवस जाग;

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यह 'सरोज स्मृति' का एक ही अंश है। नव-वधू सरोज में निराकार शृंगार के साकार होने और सादे विवाह की बात समझाएँ।
Updated On: Oct 21, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: प्रश्न को समझना:
प्रश्न 9(i) में 'सरोज स्मृति' का एक ही काव्यांश दिया गया है। इसकी लगभग 100 शब्दों में सप्रसंग व्याख्या करनी है - प्रसंग, व्याख्या और विशेष।

चरण 2: प्रसंग:
यह काव्यांश सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की कविता 'सरोज स्मृति' से लिया गया है। यह कविता कवि ने अपनी दिवंगत पुत्री सरोज की याद में लिखी है।
इस अंश में कवि सरोज के विवाह का स्मरण करता है। नव-वधू बनी सरोज को देखकर उसे अपनी स्वर्गीय पत्नी और अपने 'वसंत की प्रथम गीति' की याद आती है।

चरण 3: व्याख्या:
कवि कहता है कि जो शृंगार अब तक निराकार था, जो उसकी कविता में रस की उमड़ती धारा बनकर बहा था, जिसे उसने अपनी स्वर्गीय प्रिया के साथ गाया था और जो प्राणों में राग-रंग भरता था, वही शृंगार आज नव-वधू सरोज में रति जैसा सुंदर रूप पाकर साकार हो गया है।
मानो आकाश बदलकर धरती बन गया हो, अर्थात कल्पना का सौंदर्य धरती पर प्रत्यक्ष हो गया।
फिर कवि बताता है कि ब्याह हो गया, पर उसमें कोई आत्मीय स्वजन नहीं थे, किसी को निमंत्रण नहीं भेजा गया, घर में विवाह के गीत नहीं गूँजे और न रात-दिन जागकर उत्सव मनाया गया। विवाह बहुत सादगी से हुआ।

चरण 4: विशेष:
1. भाषा तत्सम-प्रधान, संगीतमय और भावपूर्ण है।
2. 'राग-रंग', 'रति-रूप' में अनुप्रास है और 'आकाश बदल कर बना मही' में सुंदर लाक्षणिक प्रयोग है।
3. पिता का वात्सल्य, पत्नी की स्मृति और सादे विवाह की करुणा एक साथ व्यक्त हुई है।

अंतिम उत्तर:
काव्यांश में कवि को नव-वधू सरोज में अपनी कविता का निराकार शृंगार साकार दिखता है और साथ ही बिना स्वजन, निमंत्रण और विवाह-गीतों के हुए सादे विवाह का मार्मिक चित्र है।
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