Question:

देखा विवाह आमूल नवल, तुझ पर शुभ पड़ा कलश का जल। देखती मुझे तू हँसी मंद, होठों में बिजली फँसी स्पंद उर में भर झूली छवि सुंदर प्रिय की अशब्द शृंगार-मुखर तू खुली एक-उच्छ्वास-संग, विश्वास-स्तब्ध बँध अंग-अंग नत नयनों से आलोक उतर काँपा अधरों पर थर-थर-थर।

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यह 'सरोज स्मृति' का अंश है। विवाह के समय सरोज की मुस्कान, लाज और काँपते अधरों के भाव को समझाकर व्याख्या कीजिए।
Updated On: Oct 21, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: प्रसंग:
ये पंक्तियाँ सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की कविता 'सरोज स्मृति' से ली गई हैं। यह कविता कवि ने अपनी पुत्री सरोज की मृत्यु के बाद शोक-गीत के रूप में लिखी है। इन पंक्तियों में वे सरोज के विवाह के दृश्य को याद करते हैं।

चरण 2: पंक्तियों का भाव:
कवि कहते हैं कि मैंने बिलकुल नए ढंग का विवाह देखा। सरोज पर मंगल कलश का जल पड़ा। मुझे देखकर वह धीरे से हँसी, जैसे उसके होठों में बिजली कौंध गई हो। उसके हृदय में प्रिय की सुंदर छवि भरी थी, जो बिना बोले ही शृंगार की भाषा बोल रही थी।
एक साँस के साथ उसकी झिझक खुल गई और विश्वास के कारण उसका अंग-अंग स्थिर हो गया। झुकी आँखों से उजाला उतर रहा था और होंठ थर-थर काँप रहे थे।

चरण 3: सप्रसंग व्याख्या (लगभग 100 शब्द):
इन पंक्तियों में निराला ने पुत्री सरोज के विवाह का मार्मिक चित्र खींचा है। विवाह उन्हें सामान्य रीति से अलग, नया लगा। सरोज पर मंगल कलश का जल पड़ा तो वह मुझे देखकर मंद-मंद मुस्कराई। उसकी मुस्कान होठों पर बिजली की चमक जैसी थी। उसके हृदय में प्रिय की छवि बसी थी और उसका शृंगार बिना शब्दों के बोल रहा था। विश्वास से भरे उसके अंग थमे हुए थे। झुकी आँखों में उजाला था और अधर काँप रहे थे। इस स्मृति में कवि का पिता-हृदय और पुत्री के प्रति गहरा स्नेह झलकता है।

चरण 4: काव्य-सौंदर्य:
खड़ी बोली में छायावादी कोमलता है। 'थर-थर-थर' और 'अंग-अंग' में पुनरुक्ति, 'होठों में बिजली फँसी' में सुंदर कल्पना और अनुप्रास का प्रयोग है।

अंतिम उत्तर:
कवि ने सरोज के विवाह के समय की उसकी लाज, प्रेम और विश्वास की छवि को याद कर पुत्री के प्रति अपना स्नेह और शोक प्रकट किया है।
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