Question:

यशोधर बाबू ने डी.डी.ए. के फ़्लैट के लिए पैसा क्यों जमा नहीं किया था ?

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किशनदा की कहावत 'मूरख लोग मकान बनाते हैं, सयाने उनमें रहते हैं' और यशोधर बाबू की रिटायरमेंट के बाद की योजना याद कीजिए।
  • वह रिटायरमेंट के बाद गाँव में बसना चाहते थे।
  • उन्हें तीनों में किसी एक लड़के का सरकारी नौकरी में आने का विश्वास था।
  • उनके पास फ़्लैट बुक कराने के लिए पैसे नहीं थे।
  • वे योजनाबद्ध तरीके से काम नहीं करते थे।
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The Correct Option is A

Solution and Explanation

चरण 1: प्रसंग:
यह प्रश्न मनोहर श्याम जोशी की कहानी 'सिल्वर वैडिंग' से है, जो 'वितान' में संकलित है।
यशोधर बाबू दिल्ली में सरकारी क्वार्टर में रहते थे। उनके बच्चों का मानना था कि बब्बा ने डी.डी.ए. फ़्लैट के लिए पैसा न भरकर भयंकर भूल की है।

चरण 2: यशोधर बाबू की सोच:
यशोधर बाबू किशनदा की इस बात को मानते थे कि 'मूरख लोग मकान बनाते हैं, सयाने उनमें रहते हैं।'
उनकी योजना यह थी कि नौकरी रहते सरकारी क्वार्टर में रहेंगे और रिटायर होने के बाद गाँव के पुश्तैनी घर में जाकर रहेंगे।
इसी कारण उन्होंने दिल्ली में फ़्लैट के लिए पैसा जमा नहीं किया।

चरण 3: अन्य विकल्पों की जाँच:
विकल्प 3 - पाठ में कहीं नहीं कहा गया कि उनके पास पैसे नहीं थे। वे सेक्शन ऑफ़िसर थे।
विकल्प 4 - वे नियम से चलने वाले अनुशासित व्यक्ति थे, इसलिए यह कारण नहीं बनता।
विकल्प 2 - किसी बेटे को सरकारी नौकरी मिलने की बात पाठ में एक आशा के रूप में आती है, जिससे क्वार्टर परिवार के पास बना रहे। फ़्लैट न लेने के निर्णय के पीछे उनकी मूल योजना रिटायरमेंट के बाद गाँव में बसने की थी।

अंतिम उत्तर:
विकल्प 1 - वह रिटायरमेंट के बाद गाँव में बसना चाहते थे।
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