Question:

निम्नलिखित प्रश्नों को ध्यानपूर्वक पढ़कर किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर लगभग 60 शब्दों में लिखिए :

“जहाँ तृष्णा है, बटोर रखने की स्पृहा है, वहाँ उस बल का बीज नहीं है।” कथन का आशय स्पष्ट करते हुए लिखिए कि ‘बाज़ार दर्शन’ पाठ में यह बात किस संदर्भ में कही गई है।

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भगत जी के आगे पैसे की व्यंग्य-शक्ति क्यों हारती है, इसी प्रसंग में लेखक आत्मिक बल की बात करते हैं। तृष्णा निर्बलता का चिह्न है।
Updated On: Oct 27, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: कथन का आशय :
‘तृष्णा’ का अर्थ है कभी न बुझने वाली लालसा और ‘स्पृहा’ का अर्थ है चाह। जैनेंद्र कुमार कहते हैं कि जिस मन में और अधिक पाने तथा धन-वस्तुएँ बटोरकर रखने की चाह होती है, उसमें वह आंतरिक बल पैदा ही नहीं हो सकता जो बाज़ार और पैसे के आकर्षण को हरा दे। लेखक के अनुसार संचय की तृष्णा और वैभव की चाह से व्यक्ति की निर्बलता ही प्रमाणित होती है, क्योंकि ‘निर्बल ही धन की ओर झुकता है’।

चरण 2: पाठ में संदर्भ :
यह बात चूरन बेचने वाले भगत जी के प्रसंग में कही गई है। भगत जी छह आने की कमाई होते ही बाकी चूरन बच्चों में मुफ़्त बाँट देते हैं। उन पर बाज़ार का जादू नहीं चलता और पैसे की व्यंग्य-शक्ति भी उनके आगे चूर-चूर हो जाती है। लेखक पूछता है कि वह कौन-सा बल है, और उत्तर देता है कि लोग उसे आत्मिक, धार्मिक या नैतिक बल कहते हैं, पर जहाँ तृष्णा है वहाँ उस बल का बीज नहीं है।

चरण 3: लगभग 60 शब्दों का उत्तर :
लेखक का आशय है कि लालच और संग्रह की चाह रखने वाला व्यक्ति भीतर से कमज़ोर होता है, उसमें आत्मिक बल नहीं होता। यह बात भगत जी के संदर्भ में कही गई है, जो छह आने से अधिक नहीं कमाते, बाज़ार से केवल ज़रूरत का सामान लेते हैं और जिनके आगे पैसे की व्यंग्य-शक्ति हार जाती है। उनका संतोष ही वह बल है।

अंतिम उत्तर:
तृष्णा और संचय की चाह निर्बलता का चिह्न है; यह बात संतोषी भगत जी के आत्मबल को समझाते हुए कही गई है।
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