Question:

निम्नलिखित काव्यांशों में से किसी एक की सप्रसंग व्याख्या लगभग 100 शब्दों में कीजिए: यह वह विश्वास, नहीं जो अपनी लघुता में भी काँपा, वह पीड़ा, जिस की गहराई को स्वयं उसी ने नापा; कुत्सा, अपमान, अवज्ञा के धुँधुआते कड़वे तम में यह सदा-द्रवित, चिर जागरूक, अनुरक्त-नेत्र, उल्लंब-बाहु, यह चिर-अखंड अपनापा। जिज्ञासु, प्रबुद्ध, सदा श्रद्धामय, इसको भक्ति को दे दो - यह दीप, अकेला, स्नेह भरा है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो।

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पहले प्रसंग लिखिए, फिर विश्वास, पीड़ा और अपनेपन के भाव समझाइए। अंत में दीप को पंक्ति में जोड़ने का संदेश बताइए।
Updated On: Oct 21, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: प्रसंग:
ये पंक्तियाँ अज्ञेय की कविता 'यह दीप अकेला' से ली गई हैं, जो आरोह भाग-2 में संकलित है। कवि ने दीप को व्यक्ति का प्रतीक बनाया है और उसे समाज की पंक्ति में सम्मिलित करने की बात कही है।

चरण 2: व्याख्या:
कवि कहता है कि यह दीप ऐसे विश्वास का प्रतीक है जो छोटा होने पर भी कभी नहीं काँपा। यह उस पीड़ा का प्रतीक है जिसकी गहराई को उसने स्वयं नापा है। निंदा, अपमान और उपेक्षा के धुएँ से भरे कड़वे अँधेरे में भी वह दया से भरा, सदा जागता हुआ और प्रेम भरी आँखों वाला रहा। उसके हाथ ऊपर उठे हैं और अपनेपन का उसका नाता कभी टूटता नहीं। वह जिज्ञासु, समझदार और श्रद्धा से भरा है। कवि कहता है कि ऐसे गुणों वाले दीप को भक्ति और समाज की पंक्ति में जोड़ दो।

चरण 3: विशेष:
1. 'धुँधुआते कड़वे तम' में दृश्य और स्वाद का मेल है।
2. भाषा तत्सम और गंभीर है।
3. कवि व्यक्ति की गरिमा को समाज से जोड़ने का संदेश देता है।

अंतिम उत्तर:
इन पंक्तियों का आशय है कि अकेला व्यक्ति भी विश्वास, पीड़ा सहने की शक्ति और अपनेपन से भरा है, और उसकी सच्ची सार्थकता समाज की पंक्ति में सम्मिलित होने से है।
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