संस्कृत-साहित्यस्य अनुसंवेदन के गुण: सज्जानते?
बौद्ध युगे फच्छिल सिद्धान्त: कस्य होते: प्रमुखता आत्म?
महामना मालवीय: वाराणसी - नगरे के विश्वविधायाश्य संस्कृतमं कोट?
दुर्धर्ष: कस्य प्रश्नावत आस्थात चलोलभन्त?
(i) संस्कृत-साहित्यस्य अनुसंवेदन के गुण: सज्जानते?
संस्कृत साहित्य में अनुसंवेदन (literary analysis) की क्षमता बहुत महत्वपूर्ण है। यह साहित्य केवल बौद्धिक विश्लेषण तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह मानसिक, आध्यात्मिक और सामाजिक विचारों को भी उजागर करता है। संस्कृत साहित्य के गुणों में गहरी चिंतनशीलता, तार्किक दृष्टिकोण, और आत्मीयता का सशक्त प्रवाह है, जो समाज में आदर्शों की स्थापना के लिए प्रेरित करता है। सज्जनता (virtue) का गुण संस्कृत साहित्य में प्रमुख रूप से प्रदर्शित होता है, जो समाज में नैतिकता और उच्च आदर्शों को स्थापित करने का कार्य करता है। संस्कृत साहित्य के द्वारा व्यक्ति अपने जीवन के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए सही मार्ग पर चलता है।
संस्कृत साहित्य की गहरी विचारशीलता और सृजनात्मकता को समझने के लिए इसके गुणों और आदर्शों को जानना आवश्यक है।
‘आचारण की सभ्यता’ निबंध के लेखक हैं:
‘हिन्दी नयी चाल में ढली’ यह कथन किस लेखक का है?
‘उसने कहा था’ कहानी के लेखक हैं:
‘पिंजरे की मैना’ निबंध संग्रह के लेखक हैं:
‘कलम का सिपाही’ के रचनाकार हैं:
दिए गए गद्यांश पर आधारित निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
गद्यांश: पृथ्वी के विलय रंगमंच में सभी जातियों के लिए समान क्षेत्र है। मनुष्य के मार्ग से प्रभावित पृथ्वी उसकी करके एक जीव का अधिकार है। निकट जन पीछे, छोड़कर राज्य आगे नहीं बढ़ सकता। उत्तप्त राज्य के पुरखें अंग की सुघ्र हमे लेनी होगी। राज्य के एक अंग में यदि अंधकार और बिवलता का निवास है, तो सम्पूर्ण राष्ट्र का स्वास्थ्य उठने अंग में असमर्थ रहा।
दिए गए गद्यांश पर आधारित निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
गद्यांश:कहते हैं दुनिया बड़ी भुलक्कड़ है। केवल उतना ही याद रखती है, जितने से उसका स्वार्थ साधता है। बाकियों को फेंककर आगे बढ़ जाती है। शायद अशोक से उसका स्वार्थ नहीं सधता। क्यों उसे वह याद रखती? सारा संसार स्वार्थ का अखाड़ा ही तो है।
जलवायु के फटे कितने उत्थान
दीन, कच्छुए इन्होंने - उत्तराय;
किन्तु वह बढ़ी रहे द्रुत मूर्ति
अन्युद्दय कर रही उपाय।
शक्ति के विभिन्न, जो व्यस्त
विकल बिसरे हैं, हो निष्क्षय;
सम्पन्न अवस्थ को समस्त
विज्ञानिनी मानवता हो जाय।
तुम मांसहीन, तुम रक्तहीन,
हे अस्थशेष, हे अस्तहीन,
तुम शुद्धबुद्ध आत्माकेवल,
हे चिरपुराण! हे चिर नवीन।
तुम पूर्ण इकाई जीवन की,
जिसमें असार भव-शून्यलीन,
आधार अमर, होगी जिस पर
भावी की संस्कृति समसीन।
निम्नलिखित में से किसी एक लेखक का साहित्यिक परिचय देते हुए उनकी प्रमुख रचनाओं का उल्लेख कीजिए
वसुदेवशरण अग्रवाल: