तुम मांसहीन, तुम रक्तहीन,
हे अस्थशेष, हे अस्तहीन,
तुम शुद्धबुद्ध आत्माकेवल,
हे चिरपुराण! हे चिर नवीन।
तुम पूर्ण इकाई जीवन की,
जिसमें असार भव-शून्यलीन,
आधार अमर, होगी जिस पर
भावी की संस्कृति समसीन।
“आधार अमर, होगी जिस पर” का आशय है कि गांधीजी के विचार और आदर्श अमर हैं। इन्हीं के आधार पर भविष्य की संस्कृति और समाज की नींव डाली जाएगी। इस अंश में गांधीजी के विचारों की स्थायित्व और शाश्वतता को दर्शाया गया है।
गांधीजी अपने शरीर से दुर्बल और अस्थिहीन प्रतीत होते थे, परंतु उनकी आत्मा और विचार अत्यंत शक्तिशाली थे। हड्डियों का ढाँचा मात्र उनके शरीर को दर्शाता है, परंतु उनकी विचारधारा ने उन्हें अद्वितीय बना दिया।
कवि ने गांधीजी को 'चिरपुराण' इसलिये कहा क्योंकि उनके विचार भारतीय संस्कृति की प्राचीन परंपराओं से जुड़े थे, और 'चिर नवीन' इसलिये कहा क्योंकि उनके विचार आज भी प्रासंगिक और नए हैं। गांधीजी के विचार समय की सीमाओं से परे हैं।
भविष्य में सम्पूर्ण मानवता को गांधीजी के आदर्शों पर खड़ा होना पड़ेगा। यह संकेत है कि गांधीजी के आदर्श और विचार भविष्य में सभी को मार्गदर्शन प्रदान करेंगे और समाज में एकता और शांति स्थापित करने के लिए उन आदर्शों को लागू किया जाएगा।