Question:

निम्नलिखित काव्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए : 
पूस जाड़ थरथर तन काँपा । सूरज जड़ाइ लंक दिसि तापा ॥ 
बिरह बादि भा दासन सीझ । काँपि काँपि मरौं लोहि हरि जीउ ॥ 
कंत कहाँ हैं लागौं हियरे । पंथ अपार सूझा नहीं नियरे ॥ 
सौर सुपोटी आवै जुड़ी । जानहूं सेज हिवंचल बूड़ी ॥ 
चकई निसि बिछुरें दिन मिला । हौं निसि बारस बिरह कोकिला ॥ 
रैन अकेल साथ नाही सकी । कैसे जिऔं बिछोरी पंखी ॥ 
बिरह सचान भए तन चाँड़ा । जीवत खाइ मुए नहीं छोड़ा ॥ 
रकत ढगा मांसू गरा, हाड़ भए सब संधा ॥ 
धनि सारस होइ रिरि मुई, आइ समेटहु पंख ॥ 
 

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विद्यापति की कविताओं में प्रकृति और शारीरिक अनुभवों के माध्यम से भावनाओं की तीव्रता को दर्शाया जाता है। यहाँ शीत ऋतु की पीड़ा विरह की पीड़ा को और गहरा बना देती है।
Updated On: Jan 14, 2026
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Solution and Explanation

संदर्भ:
यह काव्यांश विद्यापति की रचना से लिया गया है, जिसमें विरहिणी नायिका की मनःस्थिति और शारीरिक पीड़ा को अत्यंत मार्मिक रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह काव्य खंड मैथिली साहित्य की विरह श्रृंगार परंपरा का सुंदर उदाहरण है।
प्रसंग:
नायिका अपने प्रिय के वियोग में ठिठुरते शरीर, थरथराती देह और मानसिक क्लेश का वर्णन करती है। शीत ऋतु की पीड़ा उसके प्रेम-विरह को और अधिक तीव्र बनाती है।
व्याख्या:
नायिका पूस माह की ठंडी रातों में काँपते तन और पीड़ित हृदय के साथ जी रही है। सूरज भी उसे लंका जैसा जलाता प्रतीत होता है।
वह कहती है कि दाहक पीड़ा के कारण उसे राक्षसों जैसा व्यवहार करना आ गया है। उसके शरीर में हड्डियाँ काँप रही हैं और उसका रोम-रोम प्रियतम के बिना क्षीण हो रहा है।
नायिका को यह जीवन व्यर्थ लगने लगता है — बिना प्रियतम के न तो सोने का मन करता है, न खाने का। उसकी पीड़ा इतनी गहरी है कि वह कहती है — “रक्त ठहरा, मांस गल गया, और हाड़ भी झुलस गए।”
वह अपने प्रेमी से विनती करती है कि वह अब और विलंब न करे और तुरंत लौट आए। वह उसकी अनुपस्थिति में न जीवन जी पा रही है और न ही मृत्यु उसे स्वीकार कर रही है।
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