Question:

सप्रसंग व्याख्या सहित प्रस्तुत करें 
यह मधु है -- स्वयं काल की मौना का युग-संचय, 
यह गौरस -- जीवन-कामधेनु का अमृत-पूत पय, 
यह अंकुर -- फोड़ धरा को रवि को तकता निर्भय, 
यह प्रकृत, स्वयंभू, ब्रह्म, अयुतः इसको भी शक्ति को दे दो~। 
यह दीप अकेला, स्नेह भरा 
है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो~।

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“यह मधु है...” — जैसे प्रतीकों में आत्मा और सृजन की गहराई छिपी है — उत्तर में उनका भावार्थ स्पष्ट करें।
Updated On: Jan 14, 2026
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Solution and Explanation

सन्दर्भ:
यह अज्ञेय की कविता ‘यह दीप अकेला’ से लिया गया एक पद्यांश है जिसमें कवि रचनाशीलता, प्रकृति और आत्मबल के माध्यम से जीवन की शक्ति को पुनः पहचानने की बात करता है।
प्रसंग:
कवि अपने काव्य-दीप के माध्यम से उस सर्जनात्मक सामर्थ्य का चित्रण कर रहा है जिसे अक्सर समाज नज़रअंदाज़ कर देता है। वह चाहता है कि इस एकाकी दीप को भी उचित मान्यता मिले।
व्याख्या:
कवि कहता है — यह ‘मधु’ (रस/प्रेम/चेतना) स्वयं समय की गहनता में पकाया गया है। यह ‘गौरस’ जीवन की गहराइयों से निकला अमृत है।
यह ‘अंकुर’ — धरती की गहराई से फूटा एक नवीन जीवन है जो अपने भीतर रचनात्मक ऊर्जा लिए है।
यह प्रकृति, ब्रह्म, समय और चेतना का संगम है — इसे भी शक्ति दी जाए ताकि यह दीप बुझने न पाए।
यह दीप अकेला है, पर स्नेह से भरा हुआ है। यह समाज के गर्व, अहंकार और उदासीनता के बीच एक आशा की लौ है।
निष्कर्ष:
कवि यहाँ आत्म-अभिव्यक्ति के अधिकार की माँग करता है। यह पद्यांश रचनाकार की निजता, संघर्ष, और सामाजिक उत्तरदायित्व का प्रतीक बनकर उभरता है।
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