Question:

मैंने देखा 
एक बूँद सहसा 
उछली सागर के झाग से; 
रंग गई क्षणभर 
ढलते सूरज की आग से। 
मुझे दीख गया : 
सून स्वरूप, सम्पूर्ण 
हर आलोक – हुआ अपमान 
है उन्मेषन 
नश्वरता के दाग से। 
 

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'बूँद' और 'सूर्य की आग' जैसे प्रतीकों के माध्यम से कवि ने जीवन की क्षणभंगुरता को बड़ी सूक्ष्मता से दर्शाया है।
Updated On: Jul 21, 2025
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Solution and Explanation

संदर्भ:
यह पंक्तियाँ 'एक बूँद' शीर्षक कविता से ली गई हैं, जो मानव जीवन की क्षणभंगुरता और उसकी सीमितता को प्रतीकात्मक रूप में प्रस्तुत करती हैं।
प्रसंग:
कवि एक बूँद के क्षणिक सौंदर्य और फिर उसके लोप होने के दृश्य के माध्यम से जीवन की नश्वरता का चित्रण करता है। सूर्य की ढलती किरणें बूँद को कुछ पल के लिए अद्वितीय आभा देती हैं, परंतु वह स्थायी नहीं रहती।
व्याख्या:
कवि कहता है कि उसने एक बूँद को देखा जो सागर के झाग से उछली थी। उस क्षणिक बूँद पर ढलते सूरज की रोशनी पड़ी, जिससे वह अत्यंत सुंदर और तेजस्वी लगने लगी। लेकिन यह सौंदर्य क्षणिक था — क्षणभर में वह बूँद नष्ट हो गई।
यह दृश्य कवि को एक गहरी अनुभूति कराता है कि इस संसार में सब कुछ अस्थायी है।
बूँद का यह उन्नयन (उन्मेष) भी नश्वरता के दाग से ग्रसित है।
कवि ने इस काव्यांश के माध्यम से बताया है कि जीवन की क्षणभंगुरता में ही उसका यथार्थ छिपा है और हर सौंदर्य में नश्वरता का सत्य भी सम्मिलित है।
निष्कर्ष:
इस कविता में प्रतीकों के माध्यम से जीवन की सच्चाइयों को गहराई से चित्रित किया गया है। बूँद के माध्यम से कवि ने जीवन के सौंदर्य और उसकी सीमाओं को दर्शाया है।
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