निम्नलिखित काव्यांश में से किसी एक की सप्रसंग व्याख्या कीजिए:
यह जन है — गाता गीत जिन्हें फिर और कौन गाएगा?
पनडुब्बा — ये मोती सच्चे फिर कौन कूती लाएगा?
यह सम्भावना — ऐसी आग हटेगा बिसला सुलगाएगा।
यह अदितीय — यह मेरा — यह मैं स्वयं विसर्जित —
यह दीप, अकेला, स्नेह भरा
है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्तियों को दे दो।
निम्नलिखित काव्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर उस पर आधारित दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए:
यह हार एक विराम है
जीवन महासंग्राम है
तिल-तिल बिंधूँगा पर दया की भीख मैं लूँगा नहीं
वरदान माँगूँगा नहीं।
स्मृति सुखद प्रहरों के लिए
अपने खंडहरों के लिए
यह जान लो मैं विश्व की संपत्ति चाहूँगा नहीं
वरदान माँगूँगा नहीं।
क्या हार में क्या जीत में
किंचित नहीं भयभीत मैं
संघर्ष पथ पर जो मिले यह भी सही वह भी सही
वरदान माँगूँगा नहीं।
लघुता न अब मेरी छुओ
तुम हो महान बने रहो
अपने हृदय की वेदना मैं त्यागूँगा नहीं
वरदान माँगूँगा नहीं।
चाहे हृदय को ताप दो
चाहे मुझे अभिशाप दो
कुछ भी करो कर्तव्य पथ से किंतु भागूँगा नहीं
वरदान माँगूँगा नहीं।
निम्नलिखित गद्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर उस पर आधारित दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए:
मन और मस्तिष्क में अंतर है। मस्तिष्क में अगणित चेतना की तरंगें उठती रहती हैं। मन उन तरंगों का समुच्चय (संग्रह) है। मन को विद्वानों ने तीन मंज़िला भवन – नववकल्प, वस्तलस और सरल माना है जिनमें भाव उठते हैं और संवेदनात्मक प्रक्रिया में विकसित होते हैं, फिर क्रियात्मक रूप धारण करते हैं।
डॉ. रघुवंश ने अपनी अंगत्ता को संवेदनात्मक सुसंस्कार प्रदान की और भक्ति में सुंदरता से यह सुनिश्चित किया कि यह अंगत्ता उनके जीवन के किसी कार्य में बाधक नहीं होगी।
जीवन भर, उनके मन की सूक्ष्मता कायम रही और वे धीरे-धीरे आगे बढ़े। अपने हाथों के न होने को अपनी अक्षमता नहीं माना बल्कि व्यावहारिक योग्यताओं से पैरों से ही लिखने का अभ्यास किया और सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ते गए। उनका नवर उत्साह से भरा मन हमेशा लेखन कार्य, सेवा कार्य में संलग्न रहा।
हर प्रकार की स्वच्छता की भावना उनके स्वभाव का अभिन्न अंग रही है। बहुत से लोगों में यह स्वच्छता बाह्य रूप में ही मिलती है, पर डॉ. रघुवंश बाह्य और आंतरिक रूप में भी स्वच्छ हैं, अर्थ संबंधी मामलों में भी स्वच्छ हैं जो आजकल कम ही दिखाई देता है।
किसी युक्ति से वह दिखाने में बैठे हुए उस चालक की देय राशि निकालकर रख लेते हैं, यह विश्वसनीयता है जिसमें उनका ले जाने वाला व्यक्ति अपने पास से रुपये न दे।
उनके रहन-सहन व व्यक्तिगत जीवन में जितनी स्वच्छता मिलती है, उसका स्पष्ट प्रभाव उनके द्वारा संपादित कार्यों में परिलक्षित होता है।
यह सब कुछ संभव हो पाने के पीछे उनका मजबूत मन तो है ही, साथ ही वह संकल्प शक्ति भी है जिसे विज्ञान ने मन का लक्षण कहा है और जिसे उन्होंने स्वयं ही धारण कर ली थी क्योंकि मन ही तो संकल्पात्मक होता है।
संकल्प ही क्रिया है। संकल्प ही व्यक्ति की प्रतिष्ठा है।
मोबाइल टॉवरों का फैलता जाल — इस पर लगभग 100 शब्दों में रचनात्मक लेख लिखिए।
बारिश में खेलते बच्चे — इस पर लगभग 100 शब्दों में रचनात्मक लेख लिखिए।
रियालिटी शो : प्रतिभा की पहचान का मंच — इस पर लगभग 100 शब्दों में रचनात्मक लेख लिखिए।
निम्नलिखित काव्यांश को ध्यानपूर्वक पढ़कर उस पर आधारित दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए:
यह हार एक विराम है
जीवन महासंग्राम है
तिल-तिल बिंधूँगा पर दया की भीख मैं लूँगा नहीं
वरदान माँगूँगा नहीं।
स्मृति सुखद प्रहरों के लिए
अपने खंडहरों के लिए
यह जान लो मैं विश्व की संपत्ति चाहूँगा नहीं
वरदान माँगूँगा नहीं।
क्या हार में क्या जीत में
किंचित नहीं भयभीत मैं
संघर्ष पथ पर जो मिले यह भी सही वह भी सही
वरदान माँगूँगा नहीं।
लघुता न अब मेरी छुओ
तुम हो महान बने रहो
अपने हृदय की वेदना मैं त्यागूँगा नहीं
वरदान माँगूँगा नहीं।
चाहे हृदय को ताप दो
चाहे मुझे अभिशाप दो
कुछ भी करो कर्तव्य पथ से किंतु भागूँगा नहीं
वरदान माँगूँगा नहीं।
‘सरोज स्मृति’ कवि का एक शोक गीत है। तर्कपूर्ण उत्तर से सिद्ध कीजिए।
निम्नलिखित काव्यांश को पढ़कर दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखिए :
जहाँ भूमि पर पड़ा कि
सोना धँसता, चाँदी धँसती
धँसती ही जाती पृथ्वी में
बड़ों–बड़ों की हस्ती।
शक्तिवान जो हुआ कि
बैठा भू पर आसन मारे
खा जाते हैं उसको
मिट्टी के ढेले हत्यारे।
मातृभूमि है उसकी, जिसका
उठके जीना होता है,
दहन–भूमि है उसकी, जो
क्षण–क्षण गिरता जाता है,
भूमि खींचती है मुझको भी
नीचे धीरे–धीरे
किंतु लहराता हूँ मैं नभ पर
शीतल–मंद–समीर।
काला बादल आता है
गुरु गर्जन स्वर भरता है
विद्रोही–मस्तक पर वह
अभिषेक किया करता है।
विद्रोही हैं हमीं, हमारे
फूलों से फल आते हैं
और हमारी कुरबानी पर
जड़ भी जीवन पाते हैं।
निम्नलिखित पवित्र काव्यांश को पढ़कर प्रश्नों के सर्वाधिक उपयुक्त विकल्पों का चयन कर लिखिए :
पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढे । नीरज नयन नेह जल बाढे ॥
कबहुँ भरे मुनिनाथ निबाहा । एहि ते अधिक कहाँ मैं काहा ॥
मैं जानउँ प्रभु नाथ सुभाऊ । अपराधि पर कोप न राउ ॥
मो पर कृपा सदेइ बिसेषी । खेलत खुशी न कहूँ देखी ॥
सिपुन्स में परिहउँ न संगू । कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू ॥
हे प्रभु कृपा तिन्ह जियं जोही । हारहूँ खेल जितावहिं मोही ॥
मूंह नहेइ सकौं बस समुख कह न बैसि ।
दास तृपति न आतु लगी पाप पियाउस नै ॥
निम्नलिखित पठित काव्यांश को पढ़कर प्रश्नों के सर्वाधिक उपयुक्त विकल्पों का चयन कीजिए :
अरुण यह मधुमय देश हमारा!
जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।
सरस तामरस गर्भ विभा पर -- नाच रही तरलिका मनोहर।
छिटका जीवन हरियाली पर -- मंगल कुंकुम सारा!
लघु मधुन्धु से पंक पंकारे -- शीतल मलय समीर सहारे।
उड़ते खग जिस और मुँह किए -- समझ नीड निज प्यारा।
बरसाती आँखों के बादल -- बनते जहाँ भरे करुणा जल
लहरें टकराती अनंत की -- पाकर जहाँ किनारा।
हैम्ब-कुंभ ले उषा सवेरा -- भरती दुलाकाँति सुघ मेरे
मंदिर ऊँघते रहते जब -- जागकर रजनी भर तारा।