Question:

निम्नलिखित काव्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए :
एहि मास उपजै रस मूलु। तूँ सो भँवर मोर जोबन फूलु॥ 
नैन चुवहिं जस माँहुट नीरु। तोहि जल अंग लाग सर चीरु॥ 
टूटहिं बूँद परहिं जस ओला। बिहर पवन होई मारे झोला॥ 
केहिक सिंगार को पहिर पटोरा। गियाँ नहीं हार रही होइ डोरा॥ 
 

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विद्यापति के पदों में नायिका का प्रेम केवल भौतिक नहीं, आत्मिक और अनुभूतिजन्य होता है — यह विरह भी रस है।
Updated On: Jan 14, 2026
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Solution and Explanation

यह पद प्रसिद्ध मैथिली कवि विद्यापति द्वारा रचित है, जो राधा-कृष्ण के प्रणय और प्रेम की गहन अनुभूतियों को व्यक्त करने के लिए प्रसिद्ध हैं। यह पद श्रृंगार रस का अद्वितीय उदाहरण है जिसमें नायिका की प्रेमजनित पीड़ा, विरह-भाव और उत्कंठा अत्यंत मार्मिक रूप में उभरकर आती है।
प्रसंग: यह पद उस समय का है जब नायिका (राधा) अपने प्रिय (कृष्ण) से दूर है। वसंत ऋतु का समय है, जिसमें प्रेम, आकर्षण और सौंदर्य का ज्वार अपने चरम पर होता है। किंतु प्रिय की अनुपस्थिति में यह ऋतु भी नायिका के लिए पीड़ा का कारण बन जाती है। वह स्वयं को प्रिय के प्रति पूर्ण समर्पित अनुभव करती है।
व्याख्या: नायिका कहती है कि यह वसंत मास प्रेमरस का मूल है, लेकिन वह (कृष्ण) उसके जीवन रूपी फूल का भौंरा है। जैसे भौंरा फूल की गंध से आकर्षित होकर मँडराता है, वैसे ही वह चाहती है कि प्रिय उसके सौंदर्य पर आकर्षित होकर आए।
उसके नेत्रों से अश्रु ऐसे गिरते हैं जैसे मोम पिघलकर बूँद-बूँद टपकता है। शरीर प्रिय की स्मृति में जलता है, जिससे वह छिन्न-भिन्न हो रही है — मानो जल अग्नि बन गया हो।
वह कहती है कि बूँदें ओले की तरह उस पर गिरती हैं, और विरह का झोंका पवन बनकर उसकी देह को झकझोरता है। इस स्थिति में किसी भी प्रकार का श्रृंगार, वस्त्र या आभूषण धारण करना व्यर्थ हो गया है।
नायिका कहती है कि हार टूटकर गिर गए हैं, डोरे खुल गए हैं — अर्थात उसका तन-मन अस्त-व्यस्त हो गया है। उसका सौंदर्य अब केवल पीड़ा का स्वरूप बन गया है।
निष्कर्ष: यह पद विद्यापति की काव्यशक्ति, रूपक योजना और भावनात्मक व्यंजना का श्रेष्ठ उदाहरण है। उन्होंने नायिका के प्रेम, उसकी विरह वेदना, शारीरिक व मानसिक अवस्था को अत्यंत कोमल शब्दों में परंतु तीव्र अनुभूति के साथ प्रस्तुत किया है। प्रेम में संपूर्ण समर्पण और विछोह की तीव्रता इस पद की आत्मा है।
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