Question:

निम्नलिखित गद्यांश की सप्रसंग व्याख्या कीजिए : 
यह जो मेरे सामने कुटज का लहराता पौधा खड़ा है वह नाम और रूप दोनों में अपनी अपराजेय जीवनी शक्ति की घोषणा कर रहा है। इसीलिए यह इतना आकर्षक है। नाम है कि हज़ारों वर्ष से जीता चला आ रहा है। कितने नाम और गए। दुनिया उनको भूल गई, वे दुनिया को भूल गए। मगर कुटज है कि संस्कृत की निरंतर स्फीतमान शब्द राशि में जो जमके बैठा, सो बैठा ही है। और रूप की तो बात ही क्या है! बलिहारी है इस मादक शोभा की। चारों ओर कुपित यमराज के दारुण निःश्वास के समान धधकती लू में यह हरा भी है और भरा भी है, दुर्जन के चित्त से अधिक कटोरे पापजन की कारा में रूंधा अजात जलस्तोत्र से बरबस रस खींचकर सरस बना हुआ है।

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कुटज = संस्कृति का प्रतीक + सौंदर्य का संवाहक + दृढ़ जीवनशक्ति का स्वर — यह तीनों विशेषताएँ इसे विलक्षण बनाती हैं।
Updated On: Jan 14, 2026
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Solution and Explanation

यह गद्यांश सुप्रसिद्ध आलोचक और निबंधकार रामचंद्र शुक्ल की एक भावनात्मक और प्रतीकात्मक दृष्टि को प्रकट करता है। इसमें ‘कुटज’ नामक एक पौधे के माध्यम से उन्होंने भारतीय संस्कृति, प्रकृति और जीवनशक्ति का चित्र खींचा है। यह गद्यांश केवल वनस्पति-वर्णन नहीं, बल्कि दर्शन, भाषा और सौंदर्य-बोध का जीवंत मिश्रण है।
प्रसंग: लेखक अपने सामने खड़े एक ‘कुटज’ के पौधे को देखकर चकित हैं। यह पौधा न केवल नाम से, बल्कि अपने सौंदर्य और गुणों से भी जीवन की दृढ़ता और सजीवता का प्रतीक बन जाता है। शुक्लजी इस पौधे को केवल वनस्पति नहीं, बल्कि संस्कृति की सजीव उपस्थिति के रूप में देखते हैं।
व्याख्या: लेखक कहते हैं कि ‘कुटज’ अपने नाम और रूप दोनों में ही अद्वितीय है। ‘कुटज’ शब्द संस्कृत साहित्य में बार-बार आया है, यह शब्द हजारों वर्षों से जीवित है — जिससे इसकी सांस्कृतिक स्थायित्वता स्पष्ट होती है।
इसके सौंदर्य की चर्चा करते हुए लेखक लिखते हैं कि इसकी श्वेत-मादक शोभा मोहक है, लेकिन केवल कोमल नहीं — यह तेजस्वी भी है। इसमें विनम्रता और आक्रोश, शांति और शक्ति, दोनों का संयोजन है।
यह पौधा देखने में सुंदर है, परंतु इसका भावदर्शन गंभीर है — यह किसी भी दुष्ट, कटु, विषाक्त विचार को समर्पण नहीं करता। लेखक उसे यमराज जैसा धैर्यवान, गंभीर और न्यायप्रिय भी मानते हैं।
‘कुटज’ जीवन के प्रतीकों से भरा हुआ है — यह प्रतीक है उस जीवनशक्ति का जो बाधाओं के बीच भी खिलता है, मुस्कराता है और मजबूती से खड़ा रहता है।
निष्कर्ष: ‘कुटज’ यहाँ केवल एक पौधा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की जीवंत परंपरा, भाषिक महिमा और जीवन की अंतर्निहित जिजीविषा का प्रतीक है। लेखक के शब्दों में भाव, रस, शक्ति और दर्शन का ऐसा संगम है, जो इस गद्यांश को अनुपम बनाता है।
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