'कर्ण' का तद्भव है—
Step 1: सिद्धान्त.
तद्भव वह रूप है जो लोक-भाषाओं में विकसित हुआ हो।
Step 2: रूप-सम्बन्ध.
संस्कृत 'कर्ण' (ear) का तद्भव हिन्दी में कान होता है। अन्य विकल्प अर्थ/रूप से मेल नहीं खाते।
'कंकाल' किस विधा की रचना है?
'वैशाली में वसन्त' किसका नाटक है?
जयशंकर प्रसाद किस युग के लेखक हैं?
ऐतिहासिक उपन्यासकार है—
शुक्लोत्तर-युग की समयावधि है—
'बादल' का पर्याय है—
'कृतज्ञ' (स्कैन में 'कृतञ्ज/कूटज' सा अस्पष्ट) का विलोम है—
"चौराहा" का तत्सम है—
जो ईश्वर में विश्वास न रखता हो, उसे कहते हैं—
'पुरोहित' का संधि-विच्छेद है—