हाथी जैसी देह है, गैंडे जैसी खाल। तरबूजे-सी खोपड़ी, खरबूजे से गाल।।" उपर्युक्त पंक्तियों में कौन-सा रस है ?
'रस मीमांसा' के लेखक हैं
'तितली' कृति की विधा है :
डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद लेखक हैं :
'साहित्य और कला' रचना है :
शुक्लोत्तर - युग के लेखक हैं :
'करुण रस' का स्थायी भाव है:
'चरण-कमल बंदौं हरि राइ।' उपर्युक्त पंक्ति में अलंकार है:
'हास्य रस' का स्थायी भाव है:
'मनहुँ, मानो, जनु, जानो' आदि वाचक शब्द किस अलंकार में प्रायः प्रयुक्त होते हैं?
रस के कितने अंग होते हैं ?