Question:

निम्नलिखित प्रश्नों में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर लगभग 100 शब्दों में दीजिए: (i) निराशा, ग्लानि, चिंता और क्षोभ के अपार जल में गोते खाते सूरदास को ऐसा कौन सा मंत्र मिला कि रोते-रोते उठ खड़ा हो वह विजय-गर्व की तरंग में राख के ढेर को दोनों हाथों से उड़ाने लगा? 'सूरदास की झोंपड़ी' पाठ के आधार पर लिखिए। (ii) 'बिस्कोहर की माटी' पाठ में वर्णित बरसात की तुलना अपने क्षेत्र की बरसात से कीजिए। (iii) विकास की औद्योगिक सभ्यता के विनाश की अपसभ्यता बनने के क्या कारण हैं? पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने के उपायों का उल्लेख कीजिए।

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(i) में घीसू का वाक्य 'खेल में रोते हो' और सच्चे खिलाड़ी की भावना, (ii) में बिस्कोहर की वर्षा के दृश्य और अपने क्षेत्र से तुलना, (iii) में तालाबों-नदियों की दुर्दशा, गरम होता वातावरण और बचाव के उपाय लिखिए।
Updated On: Oct 21, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: प्रश्न को समझना:
तीन उपप्रश्नों में से किन्हीं दो के उत्तर लगभग 100 शब्दों में देने हैं। नीचे तीनों के आदर्श उत्तर हैं।

चरण 2: उत्तर (i) सूरदास को मिला मंत्र:
भैरों द्वारा झोंपड़ी जला दिए जाने के बाद सूरदास की उम्र भर की कमाई, पाँच सौ से कुछ ऊपर रुपयों की पोटली भी चली गई थी। वह राख पर बैठा निराशा, ग्लानि, चिंता और क्षोभ में रो रहा था। तभी मिठुआ रोता हुआ आया और घीसू उसे चिढ़ाने लगा, 'खेल में रोते हो!' यह बात सूरदास के लिए मंत्र बन गई। उसे लगा जैसे किसी ने हाथ पकड़कर उसे किनारे पर खड़ा कर दिया। उसने सोचा कि सच्चे खिलाड़ी कभी रोते नहीं, बाज़ी पर बाज़ी हारते हैं, चोट पर चोट खाते हैं, पर मैदान में डटे रहते हैं। जीवन भी एक खेल है। यह सोचकर वह उठ खड़ा हुआ और विजय-गर्व की तरंग में राख के ढेर को दोनों हाथों से उड़ाने लगा।

चरण 3: उत्तर (ii) बिस्कोहर की बरसात और अपने क्षेत्र की बरसात:
लेखक बताते हैं कि बिस्कोहर में वर्षा एकाएक नहीं आती थी। पहले बादल घिरते, गड़गड़ाहट होती और दिन में रात जैसा अँधेरा हो जाता। वर्षा घोड़ों की कतार की तरह दूर से दौड़ती आती दिखाई देती, पहले नदी पर, फिर बगिया पर, फिर पड़ोस में। कई दिन लगातार बरसने पर दीवारें गिरतीं, घर धँसते, कीचड़ और बदबू फैलती और बाढ़ आ जाती। पर बरसात के बाद धरती, तालाब और बूढ़ी राप्ती नदी निखर उठते और धान के पौधे झूमने लगते। हमारे शहर में भी बादलों के बाद तेज़ वर्षा आती है, गलियों में पानी भरता है और यातायात रुक जाता है। पर वहाँ गाँव जैसी नदी, तालाब और खेतों की हरियाली का सुख कम मिलता है। दोनों जगह वर्षा कष्ट और आनंद दोनों लाती है।

चरण 4: उत्तर (iii) औद्योगिक सभ्यता का अपसभ्यता बनना:
'अपना मालवा खाऊ-उजाड़ू सभ्यता में' पाठ में प्रभाष जोशी कहते हैं कि जिसे हम विकास की औद्योगिक सभ्यता कहते हैं, वह उजाड़ की अपसभ्यता है। आज के नियोजकों और इंजीनियरों ने तालाबों को गाद से भर जाने दिया और धरती के भीतर का पानी पाताल से भी निकाल लिया। सदानीरा नदियाँ गंदे पानी के नाले बन गईं। कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसों से धरती का तापमान बढ़ रहा है, समुद्र गरम हो रहे हैं और मौसम का चक्र बिगड़ रहा है। उपाय यह है कि हम अपने नदी, नाले, तालाब सँभालकर रखें, वर्षा का पानी रोकें, पेड़ लगाएँ, प्रदूषण कम करें और खाऊ-उजाड़ू जीवन-पद्धति छोड़कर संयम से संसाधनों का उपयोग करें।

अंतिम उत्तर:
इन तीनों में से कोई दो उत्तर लिखने पर प्रश्न पूरा होता है।
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