Question:

पद्यांश: अलसता की सी लता
किंतु कोमलता की वह कली
सखी नीरवता के कंधे पर डाले बाँह
छाँह-सी अम्बर पथ से चली
नहीं बजती उसके हाथों में कोई वीणा,
नहीं होता कोई अनुराग-राग-आलाप,
नूपुरों में भी रुन झुन रुन झुन रुन झुन नहीं
सिर्फ एक अव्यक्त शब्द सा 'चुप-चुप-चुप'
है गूँज रहा सब कहीं।
(v) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

Updated On: Sep 24, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: सन्दर्भ:
प्रस्तुत पंक्तियाँ सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ की कविता ‘संध्या-सुन्दरी’ से ली गई हैं। यह कविता ‘परिमल’ संग्रह में संकलित है।

चरण 2: शब्दार्थ:
नीरवता: मौन, शान्ति। छाँह: छाया। अम्बर-पथ: आकाश का मार्ग।

चरण 3: व्याख्या:
कवि कहता है कि संध्या रूपी सुन्दरी अपनी सखी नीरवता के कंधे पर बाँह रखकर चल रही है। वह आकाश-मार्ग से किसी परछाईं की तरह चुपचाप उतर रही है। जैसे छाया की कोई आहट नहीं होती, वैसे ही संध्या के आने की भी कोई आहट नहीं होती। सूर्यास्त के साथ ही सारा वातावरण शान्त हो जाता है।

चरण 4: काव्य-सौन्दर्य:
यहाँ मानवीकरण और उपमा अलंकार है। भाषा तत्सम-प्रधान, खड़ीबोली और छायावादी शैली की है।

निष्कर्ष:
कवि ने संध्या को शान्ति की सखी मानकर उसके निःशब्द आगमन का सुन्दर चित्र खींचा है।
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