Question:

पद्यांश: मैं नीर भरी दुःख की बदली।
स्पंदन में चिर निस्पंद बसा
क्रंदन में आहत विश्व हँसा
नयनों में दीपक से जलते
पलकों में निर्झरिणी मचली।
(v) उपर्युक्त पद्यांश में कवयित्री ने स्वयं को क्या बताया है?

Updated On: Sep 24, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: उत्तर:
कवयित्री ने स्वयं को ‘नीर भरी दुःख की बदली’ बताया है।

चरण 2: अर्थ:
बदली जल से भरी होती है और वर्षा करके दूसरों को शीतलता देती है। इसी प्रकार कवयित्री का जीवन वेदना और आँसुओं से भरा है, फिर भी उनकी पीड़ा संसार के लिए करुणा और सुख का कारण बनती है।

निष्कर्ष:
कवयित्री ने अपने को दुःख से भरी हुई बदली कहा है।
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