रूपक अलंकार:
जब उपमेय और उपमान में भेद न दिखाकर दोनों को एक ही रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तब 'रूपक' अलंकार होता है। इसमें उपमेय का वास्तविक रूप उपमान के समान मान लिया जाता है।
उदाहरण:
"चाँदनी की हँसी फैल रही है।"
(इसमें चाँदनी को हँसी के रूप में प्रस्तुत किया गया है।)
उत्प्रेक्षा अलंकार:
जब किसी वस्तु में किसी अन्य वस्तु की संभावना प्रकट की जाती है, किंतु उसके होने की पुष्टि नहीं की जाती, तब 'उत्प्रेक्षा' अलंकार होता है।
उदाहरण:
"जलतरंग में मानो साक्षात् वीणावादन हो रहा हो।"
(यहाँ जल की तरंगों की तुलना वीणावादन से की गई है, पर इसे पूर्ण रूप से नहीं माना गया।)