Question:

गद्यांश: राष्ट्र का तीसरा अंग जन की संस्कृति है। मनुष्यों ने युगों-युगों में जिस सभ्यता का निर्माण किया है, वही उसके जीवन की श्वास-प्रश्वास है। बिना संस्कृति के जन की कल्पना कबंध मात्र है, संस्कृति ही जन का मस्तिष्क है। संस्कृति के विकास और अभ्युदय के द्वारा ही राष्ट्र की वृद्धि सम्भव है। राष्ट्र के समग्र रूप में भूमि और जन के साथ-साथ जन की संस्कृति का महत्वपूर्ण स्थान है।
(क) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ एवं लेखक के नाम लिखिए।

Updated On: Sep 23, 2026
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Solution and Explanation

उत्तर:
यह अवतरण राष्ट्र की अवधारणा — भूमि, जन और संस्कृति की त्रयी — पर केन्द्रित सांस्कृतिक-राष्ट्रवादी निबन्ध-शैली का है, जो आचार्य वासुदेवशरण अग्रवाल की राष्ट्र-सम्बन्धी निबन्ध-परम्परा से मेल खाता है; प्रकाशित पाठ्यपुस्तक में अंकित यही शीर्षक/लेखक-नाम अंतिम उत्तर के रूप में लिखें।
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