Question:

निम्नलिखित गद्यांश पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए: "भाग्य को भी मैं इसी तरह मानता हूँ। वह तो विधाता का ही दूसरा नाम है। वे सर्वान्तर्यामी और सार्वकालिक रूप में हैं, उनका अस्त ही कब है कि उदय हो। यानी भाग्य के उदय का प्रश्न सदा हमारी अपनी अपेक्षा से है। धरती का रुख सूरज की तरफ हो जाय, यही उसके लिए सूर्योदय है। ऐसे ही मैं मानता हूँ कि हमारा मुख सही भाग्य की तरफ हो जाय तो इसी को भाग्योदय कहना चाहिए।" (क) पाठ एवं लेखक का नाम लिखिए। (ख) भाग्य किसका दूसरा नाम है? (ग) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए। (घ) भाग्य के उदय का प्रश्न किससे है? (ङ) 'सर्वान्तर्यामी' और 'सार्वकालिक' शब्दों के अर्थ लिखिए।

Updated On: Sep 23, 2026
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Solution and Explanation

Step 1: पाठ एवं लेखक:
यह अंश भाग्य और पुरुषार्थ के सम्बन्ध पर आधारित एक चिन्तनपरक निबन्ध से लिया गया है (मूल पाठ्यपुस्तक से सत्यापन अनुशंसित)।

Step 2: भाग्य किसका दूसरा नाम है:
लेखक के अनुसार भाग्य विधाता का ही दूसरा नाम है।

Step 3: व्याख्या:
विधाता सदैव, हर समय विद्यमान रहते हैं; उनका न कभी अस्त होता है न उदय — अतः भाग्य का 'उदय होना' वास्तव में हमारी अपनी दृष्टि/प्रयास के सही दिशा में मुड़ने पर निर्भर करता है, जैसे सूर्य सदा रहता है, धरती का रुख उसकी ओर होने से ही सूर्योदय प्रतीत होता है।

Step 4: प्रश्न किससे है:
भाग्य के उदय का प्रश्न हमारी अपनी अपेक्षा/दृष्टिकोण और पुरुषार्थ से है, बाहरी शक्ति से नहीं।

Final Answer:
सर्वान्तर्यामी = सबके भीतर व्याप्त रहने वाला; सार्वकालिक = सभी कालों में सदा विद्यमान रहने वाला।
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