Question:

पद्यांश: कहा आगंतुक ने सस्नेह-
'अरे तुम इतने हुए अधीर!
हार बैठे जीवन का दाँव
जीतते मरकर जिसको वीर।
तप नहीं केवल जीवन सत्य
करुण यह क्षणिक दीन अवसाद;
तरल आकांक्षा से है भरा
सो रहा आशा का आह्लाद।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

Updated On: Sep 24, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: प्रसंग:
जल-प्रलय के बाद मनु हिमालय पर अकेले और निराश बैठे हैं। वहाँ आई श्रद्धा उनकी हताशा देखकर स्नेह से समझाना शुरू करती है। ये पंक्तियाँ उसी समझाने का आरम्भ हैं।

चरण 2: शब्दार्थ:
आगंतुक = आने वाली (श्रद्धा), सस्नेह = प्रेम के साथ, अधीर = बेचैन या घबराया हुआ, दाँव = बाजी, तप = कठोर कष्ट या साधना, क्षणिक = थोड़ी देर का, अवसाद = उदासी, तरल आकांक्षा = कोमल और बहती हुई इच्छा, आह्लाद = आनन्द।

चरण 3: व्याख्या:
श्रद्धा कहती है कि हे मनु, तुम इतने बेचैन क्यों हो गए? तुमने तो जीवन की बाजी ही हार मान ली। जबकि सच्चे वीर मरकर भी उस बाजी को जीत जाते हैं, अर्थात् मृत्यु से पहले हार नहीं मानते। केवल तप और कष्ट ही जीवन का सत्य नहीं है। यह करुण और दीन उदासी तो क्षणभर की है, हमेशा रहने वाली नहीं। इसके भीतर कोमल इच्छाओं से भरा आशा का आनन्द सोया पड़ा है। उसे जगाना ही तुम्हारा काम है।

चरण 4: काव्य-सौन्दर्य:
भाषा तत्सम शब्दों वाली खड़ी बोली है। ‘आशा का आह्लाद’ में अनुप्रास है। शैली सम्बोधन की है और भाव उपदेशात्मक तथा प्रेरणादायक है।

निष्कर्ष:
दुःख स्थायी नहीं है। मनुष्य को निराशा छोड़कर आशा और कर्म का सहारा लेना चाहिए।
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