Question:

सौर सुपेती आवै जूड़ी। जानहुँ सेज हिवंचल बूढ़ी। चकई निसि बिछुरैं दिन मिला। हौं निसि बासर बिरह कोकिला। रैनि अकेलि साथ नहिं सखी। कैसे जिऔं बिछोही पँखी। बिरह सचान भवैं तन चाँड़ा। जीयत खाइ मुएँ नहिं छाँड़ा। रकत ढरा माँसू गरा, हाड़ भए सब संख। धनि सारस होइ ररि मुई, आइ समेटहु पंख॥

Show Hint

यह बारहमासा का पूस मास वाला अंश है। 'हिवंचल बूड़ी' का अर्थ हिम में डूबी है। चकई, कोकिला, सचान और सारस के बिंबों से विरह समझाएँ।
Updated On: Oct 21, 2026
Show Solution
collegedunia
Verified By Collegedunia

Solution and Explanation

चरण 1: प्रश्न को समझना:
यह वैकल्पिक (OR) काव्यांश है। इसकी लगभग 100 शब्दों में सप्रसंग व्याख्या करनी है।

चरण 2: प्रसंग:
यह अंश मलिक मुहम्मद जायसी के 'पद्मावत' के 'बारहमासा' से लिया गया है। इसमें विरहिणी नायिका नागमती पूस महीने की कड़ी ठंड में अपने प्रिय के वियोग की पीड़ा बताती है।

चरण 3: व्याख्या:
नागमती कहती है कि जाड़े के ओढ़ने-बिछाने के वस्त्र (सौर-सुपेती) भी ठंडे लगते हैं, जाड़ा चढ़ आता है, मानो सेज हिम (बर्फ़) में डूबी हुई हो।
चकवी रात में बिछुड़ती है, पर दिन में अपने साथी से मिल जाती है। मैं तो रात-दिन विरह की कोयल बनी रहती हूँ।
रात में मैं अकेली हूँ, कोई सखी भी साथ नहीं, तो यह बिछुड़ी पक्षी कैसे जिए? विरह रूपी प्रचंड बाज़ मेरे शरीर पर मँडराता है, जीते जी खाता है और मरने पर भी नहीं छोड़ेगा।
रक्त बह गया, माँस गल गया और हड्डियाँ शंख जैसी हो गईं। यह स्त्री सारस की तरह प्रिय को रट-रटकर मर गई, हे प्रिय, अब आकर इसके पंख समेट लो।

चरण 4: विशेष:
1. ठेठ अवधी भाषा और चौपाई-दोहा छंद है।
2. 'जानहुँ सेज हिवंचल बूड़ी' में उत्प्रेक्षा, 'बिरह सचान' में रूपक और 'हाड़ भए सब संख' में उपमा अलंकार है।
3. वियोग शृंगार और अतिशयोक्ति से विरह-दशा अत्यंत मार्मिक बनी है।

अंतिम उत्तर:
पूस की ठंड में नागमती का विरह इतना बढ़ गया है कि उसका शरीर सूखकर हड्डियों का ढाँचा रह गया है और वह मरकर भी प्रिय की प्रतीक्षा करती है।
Was this answer helpful?
0
0

Top CBSE CLASS XII Hindi Elective Questions

View More Questions

Top CBSE CLASS XII मलिक मुहम्मद जायसी — बारहमासा Questions