Question:

घर-घर चीर रचा सब काहूँ। मोर रूप रँग लै गा नाहू॥ पलटि न बहुरा गा जो बिछोई। अबहूँ फिरै फिरै रँग सोई॥ सियरि अगिनि बिरहिनि हिय जारा। सुलगि सुलगि दगधै भै छारा॥ यह दुख दगध न जानै कंतू। जोबन जनम करै भसमंतू॥ पिय सौं कहेहु सँदेसड़ा, ऐ भँवरा ऐ काग। सौ धनि बिरहें जरि मुई, तेहिक धुआँ हम लाग॥

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यह बारहमासा का अगहन मास वाला अंश है। जाड़े में सबके वस्त्र सजाने और नागमती के रूप-रंग के पति के साथ चले जाने की बात से व्याख्या शुरू कीजिए।
Updated On: Oct 21, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: व्याख्या की रूपरेखा:
सप्रसंग व्याख्या में पहले प्रसंग, फिर पंक्तियों की व्याख्या और अंत में काव्य-सौंदर्य लिखा जाता है। उत्तर लगभग 100 शब्दों में हो।

चरण 2: प्रसंग:
ये पंक्तियाँ मलिक मुहम्मद जायसी के महाकाव्य 'पद्मावत' के 'बारहमासा' अंश से ली गई हैं। राजा रत्नसेन के चले जाने पर रानी नागमती विरह में है। यह अगहन मास का वर्णन है, जब दिन छोटे और रातें लंबी हो जाती हैं और जाड़ा शुरू होता है।

चरण 3: व्याख्या:
नागमती कहती है कि अगहन की ठंड में घर-घर में सब लोगों ने जाड़े के वस्त्र तैयार कर लिए हैं, पर मेरा रूप-रंग तो मेरे पति अपने साथ ले गए। जो बिछुड़कर गया, वह पलटकर नहीं लौटा। यदि वह अब भी लौट आए, तो मेरा वही रूप-रंग फिर लौट आए। यह ठंडी आग जैसी विरह-ज्वाला मेरे हृदय को जला रही है, सुलग-सुलगकर मैं राख हो गई हूँ। मेरे पति इस जलन को नहीं जानते, जो मेरे यौवन और जीवन को भस्म कर रही है। अंत में वह भौंरे और कौए से कहती है कि प्रिय से संदेश कहना कि वह स्त्री विरह में जलकर मर गई और उसी आग का धुआँ लगने से हम काले हो गए।

चरण 4: विशेष:
इसमें वियोग शृंगार रस है। भाषा अवधी है और चौपाई-दोहा छंद हैं। 'सियरि अगिनि' (ठंडी आग) में विरोधाभास है। 'सुलगि सुलगि' और 'फिरै फिरै' में पुनरुक्ति प्रकाश है। भौंरे और कौए के काले होने का कारण विरह का धुआँ बताने में अतिशयोक्ति और कल्पना की सुंदरता है।

अंतिम उत्तर:
अगहन मास में नागमती की असहनीय विरह-पीड़ा और प्रिय के लौटने की व्याकुल चाह का मार्मिक चित्रण है।
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