Question:

व्यक्ति की 'आत्मा' केवल व्यक्ति तक ही सीमित नहीं है, वह व्यापक है। अपने में सब और सबमें आप - इस प्रकार की एक समष्टि-बुद्धि जब तक नहीं आती तब तक पूर्ण सुख का आनंद भी नहीं मिलता। अपने आप को दलित द्राक्षा की भाँति निचोड़कर जब 'सर्व' के लिए निछावर नहीं कर दिया जाता तब तक स्वार्थ खंड-सत्य है, वह मोह को बढ़ावा देता है, तृष्णा को उत्पन्न करता है और मनुष्य को दयनीय कृपण बना देता है। कार्पण्य दोष से जिसका स्वभाव उपहत हो गया है उसकी दृष्टि म्लान हो जाती है, वह स्पष्ट नहीं देख पाता।

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यह 'कुटज' निबंध का अंश है। याज्ञवल्क्य के 'आत्मा' वाले कथन के बड़े अर्थ और 'दलित द्राक्षा' की उपमा को समझाएँ।
Updated On: Oct 21, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: प्रश्न को समझना:
यह वैकल्पिक (OR) अंश है, इसलिए इसकी लगभग 100 शब्दों में सप्रसंग व्याख्या करनी है।
व्याख्या में पहले प्रसंग, फिर अर्थ और अंत में विशेष बातें लिखी जाती हैं।

चरण 2: प्रसंग:
यह गद्यांश आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी के ललित निबंध 'कुटज' से लिया गया है।
इससे ठीक पहले लेखक ऋषि याज्ञवल्क्य की बात याद करता है कि संसार में सब कुछ अपने मतलब के लिए प्रिय होता है - 'आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति'।
लेखक कहता है कि याज्ञवल्क्य की बात अंतिम नहीं थी, वे 'आत्मा' शब्द का अर्थ और बड़ा करना चाहते थे। यह अंश उसी बड़े अर्थ को समझाता है।

चरण 3: व्याख्या:
लेखक कहता है कि व्यक्ति की आत्मा केवल उसी व्यक्ति तक सीमित नहीं है, वह सब में फैली हुई है।
जब तक मनुष्य में 'अपने में सब और सबमें आप' वाली समष्टि-बुद्धि नहीं आती, तब तक उसे पूरा सुख नहीं मिलता।
जैसे निचोड़ा हुआ अंगूर अपना सारा रस दे देता है, वैसे ही जब तक मनुष्य अपने को 'सर्व' यानी सबके लिए निछावर नहीं कर देता, तब तक उसका स्वार्थ खंड-सत्य यानी अधूरा सत्य है।
ऐसा अधूरा स्वार्थ मोह को बढ़ाता है, तृष्णा पैदा करता है और मनुष्य को दयनीय कंजूस बना देता है।
कंजूसी के दोष से जिसका स्वभाव बिगड़ जाता है, उसकी दृष्टि मैली हो जाती है और वह कुछ भी साफ़ नहीं देख पाता।

चरण 4: विशेष:
1. भाषा तत्सम शब्दों से युक्त है, जैसे समष्टि-बुद्धि, कार्पण्य, उपहत, म्लान।
2. 'दलित द्राक्षा की भाँति' में उपमा अलंकार है।
3. शैली विचारात्मक है, उपनिषद के एक कथन को नया और व्यापक अर्थ दिया गया है।

अंतिम उत्तर:
लेखक के अनुसार सच्चा और पूरा सुख अपने को सबके लिए अर्पित करने में है, अधूरा स्वार्थ मनुष्य को मोह, तृष्णा और कृपणता में बाँध देता है।
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