Question:

पहचानता हूँ उजाड़ के साथी, तुम्हें अच्छी तरह पहचानता हूँ। नाम भूल रहा हूँ। प्रायः भूल जाता हूँ। रूप देखकर प्रायः पहचान जाता हूँ, नाम नहीं याद आता। पर नाम ऐसा है कि जब तक रूप के पहले ही हाज़िर न हो जाए तब तक रूप की पहचान अधूरी रह जाती है। ......... सैकड़ों बार का कचारा-निचोड़ा प्रश्न सामने आ गया - रूप मुख्य है या नाम ? नाम बड़ा है या रूप ? पद पहले है या पदार्थ ? पदार्थ सामने है, पद नहीं सूझ रहा है। मन व्याकुल हो गया। स्मृतियों के पंख फैलाकर सुदूर अतीत के कोनों में झाँकता रहा।

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प्रसंग में 'कुटज' निबंध और शिवालिक के पौधे का उल्लेख कीजिए। फिर नाम और रूप के द्वंद्व को सरल शब्दों में समझाइए।
Updated On: Oct 21, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: व्याख्या का ढाँचा:
इस गद्यांश की व्याख्या में प्रसंग, भाव और विशेष लिखे जाएँगे। शब्द-सीमा लगभग 100 मानी गई है।

चरण 2: प्रसंग:
यह अंश हज़ारी प्रसाद द्विवेदी के निबंध 'कुटज' से लिया गया है। लेखक हिमालय की शिवालिक पहाड़ियों पर सूखी, पथरीली जगह पर खिले एक पौधे को देखता है। वह उसे पहचानता है, पर उसका नाम याद नहीं कर पाता।

चरण 3: व्याख्या:
लेखक उजाड़ के उस साथी से कहता है कि मैं तुम्हें अच्छी तरह पहचानता हूँ, पर तुम्हारा नाम भूल रहा हूँ। अक्सर रूप देखकर पहचान लेता हूँ, पर नाम याद नहीं आता। नाम ऐसा है कि जब तक वह रूप के साथ न जुड़े, पहचान अधूरी लगती है। इसी से सैकड़ों बार का घिसा-पिटा प्रश्न फिर सामने आता है कि रूप बड़ा है या नाम, पद पहले है या पदार्थ। पदार्थ सामने है पर नाम नहीं सूझ रहा, इसलिए मन व्याकुल है और वह पुरानी यादों में नाम खोजता है।

चरण 4: विशेष:
1. रूप और नाम के संबंध पर गहरा चिंतन है।
2. भाषा सरल, पर शैली चिंतनशील और आत्मीय है।
3. 'स्मृतियों के पंख फैलाकर' में सुंदर रूपक है।

अंतिम उत्तर:
लेखक कहता है कि रूप की पहचान नाम के बिना अधूरी रहती है, और इसी से उसका मन बेचैन हो उठता है।
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