पद्यांश: रोकहिं जो तो अमंगल होय औ प्रेम नसै जो कहैं पिय जाइये। जौ कहे जाहु न तो प्रभुता जौ कहूँ न कहै तो सनेह नसाइये। जो 'हरिचंद कहैं तुमरे बिनु जीहै' न तो यह क्यौ पतिआइये। तासों पयान समै तुमरे हम का कहैं आपै हमै समझाइये।।
(ख) रेखांकित अंश ('जौ कहे जाहु न तो प्रभुता जौ कहूँ न कहै तो सनेह नसाइये') की व्याख्या कीजिए।
व्याख्या: नायिका असमंजस में है — यदि वह पति को यात्रा पर जाने से मना करे तो यह उसकी प्रभुता (अधिकार जताने) जैसा प्रतीत होगा, और यदि वह चुप रहकर कुछ न कहे तो उसका प्रेम ही संदिग्ध या नष्ट माना जाएगा। इस प्रकार कवि ने विरह-वेदना में डूबी नायिका के मनोद्वन्द्व को अत्यंत सूक्ष्मता से चित्रित किया है।