पद्यांश: रोकहिं जो तो अमंगल होय औ प्रेम नसै जो कहैं पिय जाइये। जौ कहे जाहु न तो प्रभुता जौ कहूँ न कहै तो सनेह नसाइये। जो 'हरिचंद कहैं तुमरे बिनु जीहै' न तो यह क्यौ पतिआइये। तासों पयान समै तुमरे हम का कहैं आपै हमै समझाइये।।
(क) उपर्युक्त पद्यांश के पाठ और रचयिता का नाम लिखिए।
उत्तर: पंक्ति के अंत में 'हरिचंद' छाप (नाम-मुद्रा) होने से स्पष्ट है कि यह पद्यांश आधुनिक हिन्दी गद्य-पद्य के जनक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की ब्रजभाषा-रचना से लिया गया है।