अकेलेपन से जो लोग दुखी हैं,
वृत्तियाँ उनकी
निश्चय ही, बहिर्मुखी हैं।
सृष्टि से बाँधने वाला तार
उनका टूट गया है;
असली आनन्द का आधार
छूट गया है।
उद्गम से छूटी हुई नदियों में ज्वार कहाँ ?
जड़-कटे पौधों में जीवन की धार कहाँ ?
तब भी, जड़-कटे पौधों के ही समान
रोते हैं ये उखड़े हुए लोग बेचारे;
जीना चाहते हैं भीड़-भम्भड़ के सहारे।
भीड़, मगर, टूटा हुआ तार
और तोड़ती है
कटे हुए पौधों की
जड़ नहीं जोड़ती है।
बाहरी तरंगों पर जितना ही फूलते हैं;
हम अपने को उतना ही और भूलते हैं।
जड़ जमाना चाहते हो
तो एकान्त में जाओ;
अगम-अज्ञात में अपनी सोरें फैलाओ।
अकेलापन है राह
अपने आपको पाने की;
जहाँ से तुम निकल चुके हो,
उस घर में वापस जाने की।
वृत्तियाँ उनकी, निश्चय ही बहिर्मुखी हैं – पंक्ति के संदर्भ में ‘वृत्ति’ का अर्थ है –
‘उद्गम से छूटी हुई नदियों में ज्वार कहाँ ?’ – पंक्ति से अभिप्राय है –
भीड़ का क्या स्वभाव है ?
‘बाहरी तरंगों पर जितना ही फूलते हैं’ – पंक्ति में ‘बाहरी तरंग’ से आशय है –
‘जड़ जमाना चाहते हो, तो एकान्त में जाओ’ – इन पंक्तियों में ‘जड़ जमाना’ से अभिप्राय है –