Question:

पद्यांश: यही आता है इस मन में,
छोड़ धाम धन जाकर मैं भी रहूँ उसी वन में।
प्रिय के व्रत में विघ्न न डालूँ, रहूँ निकट भी दूर।
व्यथा रहे, पर साथ-साथ ही समाधान भरपूर।
हर्ष डूबा हो रोदन में,
यही आता है इस मन में।
(iv) 'रहूँ निकट भी दूर' से क्या अभिप्राय है?

Updated On: Sep 24, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: पंक्ति का संदर्भ:
‘रहूँ निकट भी दूर’ मैथिलीशरण गुप्त के ‘साकेत’ के नवम सर्ग में उर्मिला की उक्ति है।

चरण 2: अभिप्राय:
उर्मिला चाहती है कि वह वन में लक्ष्मण के पास ही रहे, पर उनसे इतनी दूरी रखे कि उनके व्रत में बाधा न पड़े। यानी वह शरीर से पास होकर भी मिलने की आस से दूर रहेगी। लक्ष्मण भाई और भाभी की सेवा में लगे हैं, उन्हें अपनी पत्नी का मोह न सताए।

चरण 3: भाव:
इसमें उर्मिला का त्याग, संयम और पति के कर्तव्य के प्रति आदर प्रकट होता है।

अंतिम उत्तर:
पास रहकर भी पति के व्रत की रक्षा के लिए दूर रहना, यही इसका आशय है।
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