Question:

पद्यांश: मैं नीर भरी दुःख की बदली।
स्पंदन में चिर निस्पंद बसा
क्रंदन में आहत विश्व हँसा
नयनों में दीपक से जलते
पलकों में निर्झरिणी मचली।
(iv) कवयित्री के निरंतर रुदन का क्या कारण है?

Updated On: Sep 24, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: पद्यांश के आधार पर कारण:
कवयित्री के हृदय में वेदना सदा बसी रहती है। उनके जीवन में प्रिय से वियोग की पीड़ा और दुःख भरा है। यही पीड़ा आँसू बनकर आँखों से निरंतर बहती रहती है।

चरण 2: पंक्तियों से प्रमाण:
‘स्पंदन में चिर निस्पंद बसा’ बताता है कि हर धड़कन में स्थायी पीड़ा है। ‘पलकों में निर्झरिणी मचली’ बताता है कि पलकों में आँसुओं का झरना उमड़ रहा है।

निष्कर्ष:
निरंतर रुदन का कारण उनके हृदय में बसी गहरी विरह-वेदना है।
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