Question:

पद्यांश: कहा आगंतुक ने सस्नेह-
'अरे तुम इतने हुए अधीर!
हार बैठे जीवन का दाँव
जीतते मरकर जिसको वीर।
तप नहीं केवल जीवन सत्य
करुण यह क्षणिक दीन अवसाद;
तरल आकांक्षा से है भरा
सो रहा आशा का आह्लाद।
(iv) श्रद्धा दुःख को किसके समान मानती है और क्यों?

Updated On: Sep 24, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: प्रश्न को समझें:
प्रश्न पूछता है कि श्रद्धा दुःख को किसके समान मानती है और क्यों। पद्यांश में दुःख के लिए ‘करुण, क्षणिक, दीन अवसाद’ शब्द आए हैं।

चरण 2: उत्तर:
श्रद्धा दुःख को क्षणिक अवसाद के समान मानती है, अर्थात् ऐसी उदासी जो थोड़ी देर टिकती है और बीत जाती है। पद्यांश में कोई अलग उपमा नहीं दी गई है, वह इसे साफ शब्दों में क्षणिक कहती है।

चरण 3: कारण:
उसके अनुसार तप और कष्ट ही जीवन का सत्य नहीं हैं। इस उदासी के भीतर कोमल आकांक्षाओं से भरा आशा का आनन्द सोया हुआ है। इसलिए दुःख स्थायी नहीं, केवल क्षणभर का है।

अंतिम उत्तर:
श्रद्धा दुःख को क्षणिक अवसाद मानती है, क्योंकि वह जीवन का स्थायी सत्य नहीं है और उसके पीछे आशा का आनन्द छिपा है।
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