Question:

पद्यांश: दुःख की पिछली रजनी बीच
विकसता सुख का नवल प्रभात;
एक परदा यह झीना नील
छिपाये है जिसमें सुख गात।
जिसे तुम समझे हो अभिशाप,
जगत की ज्वालाओं का मूल;
ईश का वह रहस्य वरदान
कभी मत इसको जाना भूल।
(iii) प्रस्तुत पद्यांश का केन्द्रीय भाव लिखिए।

Updated On: Sep 24, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: केन्द्रीय भाव:
इस पद्यांश का मूल भाव यह है कि दुःख जीवन का अन्त नहीं है। दुःख के बाद सुख अवश्य आता है। मनुष्य को हताश होकर बैठना नहीं चाहिए।

चरण 2: विस्तार:
श्रद्धा मनु से कहती है कि तुम जिस दुःख को अभिशाप और संसार की पीड़ा की जड़ मानते हो, वह वास्तव में ईश्वर का गूढ़ वरदान है। दुःख हमें मजबूत बनाता है और सुख का मूल्य सिखाता है।

निष्कर्ष:
कवि आशा, धैर्य और सकारात्मक सोच का सन्देश देता है।
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