Question:

पद्यांश: अलसता की सी लता
किंतु कोमलता की वह कली
सखी नीरवता के कंधे पर डाले बाँह
छाँह-सी अम्बर पथ से चली
नहीं बजती उसके हाथों में कोई वीणा,
नहीं होता कोई अनुराग-राग-आलाप,
नूपुरों में भी रुन झुन रुन झुन रुन झुन नहीं
सिर्फ एक अव्यक्त शब्द सा 'चुप-चुप-चुप'
है गूँज रहा सब कहीं।
(ii) कवि ने संध्या को किस रूप में चित्रित किया है?

Updated On: Sep 24, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: प्रश्न का आधार:
कवि ने इस पद्यांश में संध्या का मानवीकरण किया है। वह उसे जीती-जागती नारी की तरह दिखाता है।

चरण 2: संध्या का रूप:
कवि ने संध्या को एक सुकुमार, सलज्ज और शान्त सुन्दरी के रूप में चित्रित किया है। वह आलस्य से भरी लता और कोमल कली जैसी लगती है।
वह मौन को अपनी सखी बनाकर उसके कंधे पर बाँह डाले आकाश-मार्ग से धीरे-धीरे उतर रही है।

चरण 3: विशेषता:
उसके हाथ में वीणा नहीं है और पैरों में नूपुर की झंकार भी नहीं है। चारों ओर केवल चुप-चुप का अव्यक्त स्वर गूँज रहा है।

अंतिम उत्तर:
कवि ने संध्या को मौन-प्रिय, कोमल और आलसी-सी सुन्दरी के रूप में चित्रित किया है।
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