Question:

पद्यांश: मैं नीर भरी दुख की बदली!
स्पंदन में चिर निस्पंद बसा,
क्रंदन में आहत विश्व हँसा,
नयनों में दीपक से जलते,
पलकों में निर्झरिणी मचली!
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

Updated On: Sep 24, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: शब्दार्थ:
नीर = जल; बदली = छोटा बादल; स्पंदन = धड़कन, हलचल; चिर = सदा, बहुत समय से; निस्पंद = स्थिर, गतिहीन।

चरण 2: व्याख्या:
कवयित्री कहती हैं कि मैं जल से भरी हुई दुःख की बदली हूँ। जैसे बदली में पानी भरा रहता है, वैसे ही मेरे हृदय में पीड़ा भरी है। मेरे हृदय की हर धड़कन में सदा से एक ठहरी हुई, शांत वेदना बसी हुई है। बाहर से मैं हलचल में दिखती हूँ, पर भीतर स्थायी पीड़ा है। वही पीड़ा मेरे जीवन का आधार बन गई है। यहाँ विरोध का सुंदर भाव है, क्योंकि स्पंदन में निस्पंदता का बसना विरोधाभास है।

चरण 3: काव्य-सौन्दर्य:
भाषा खड़ी बोली है, जिसमें तत्सम शब्दों की प्रधानता है। ‘नीर भरी दुःख की बदली’ में रूपक अलंकार है। स्पंदन और निस्पंद के प्रयोग से विरोधाभास बना है। शैली गीतात्मक और भावपूर्ण है।
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