Question:

पद्यांश: यही आता है इस मन में,
छोड़ धाम धन जाकर मैं भी रहूँ उसी वन में।
प्रिय के व्रत में विघ्न न डालूँ, रहूँ निकट भी दूर।
व्यथा रहे, पर साथ-साथ ही समाधान भरपूर।
हर्ष डूबा हो रोदन में,
यही आता है इस मन में।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

Updated On: Sep 24, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: संदर्भ:
प्रस्तुत पंक्तियाँ मैथिलीशरण गुप्त के महाकाव्य ‘साकेत’ के नवम सर्ग के गीत ‘यही आता है इस मन में’ से ली गई हैं। यह उर्मिला की विरह-व्यथा का गीत है।

चरण 2: शब्दार्थ:
प्रिय = पति लक्ष्मण; व्रत = चौदह वर्ष की सेवा का संकल्प; विघ्न = बाधा; निकट = पास।

चरण 3: व्याख्या:
उर्मिला सोचती है कि वह भी वन में जाकर पति के पास रहे। पर वह जानती है कि लक्ष्मण ने राम और सीता की सेवा का व्रत लिया है। इसलिए वह चाहती है कि उसके कारण उस व्रत में कोई रुकावट न आए। वह पति के पास रहकर भी उनसे दूर रहना चाहती है, ताकि उन्हें उसकी याद में उलझना न पड़े।

चरण 4: विशेष:
इन पंक्तियों में उर्मिला का त्याग और पति के कर्तव्य का सम्मान झलकता है। ‘निकट भी दूर’ में विरोधाभास अलंकार है।

निष्कर्ष:
उर्मिला पति के पास रहना चाहती है, पर उनके व्रत की रक्षा के लिए दूरी भी स्वीकार करती है।
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