Question:

पद्यांश: ज्यों ज्यों लगती नाव पार
उर में आलोकित शत विचार!
इस धरा सा ही जग का क्रम
शाश्वत इस जीवन का उद्गम
शाश्वत है गति, शाश्वत संगम
शाश्वत नभ का नीला विकास,
शाश्वत शशि का यह रजत हास,
शाश्वत लघु लहरों का विलास
हे जगजीवन के कर्णधार!
चिर जन्म मरण के आर-पार,
शाश्वत जीवन नौका विहार।
मैं भूल गया अस्तित्व ज्ञान,
जीवन का यह शाश्वत प्रमाण
करता मुझको अमरत्व दान!
(i) उपर्युक्त पद्यांश के कवि एवं पद्यांश का नाम लिखिए।

Updated On: Sep 24, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: पद्यांश की पहचान:
ये पंक्तियाँ ‘नौका-विहार’ कविता का अंतिम अंश हैं। इसमें कवि गंगा की धारा में नाव-यात्रा का अनुभव कहते हैं।

चरण 2: कवि का नाम:
इस पद्यांश के कवि छायावाद के प्रमुख कवि सुमित्रानन्दन पन्त हैं। प्रकृति का सुकुमार चित्रण उनकी पहचान है।

अंतिम उत्तर:
कवि: सुमित्रानन्दन पन्त। पद्यांश का नाम (कविता): नौका-विहार।
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