Question:

पद्यांश: मुझे फूल मत मारो
मैं अबला बाला वियोगिनी कुछ तो दया विचारो
होकर मधु के मीत मदन, पटु तुम कटु गरल न गारो
मुझे विकलता तुम्हें विफलता, ठहरो, श्रम परिहारो
नहीं भोगिनी यह मैं कोई, जो तुम जाल पसारो
बल हो तो सिंदूर-बिन्दु यह-यह हरनेत्र निहारो।
रूप-दर्प कंदर्प, तुम्हें तो मेरे पति पर बारो,
लो यह मेरी चरण धूलि, उस रति के सिर पर धारो।
(i) उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।

Updated On: Sep 24, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: सन्दर्भ:
प्रस्तुत पद्यांश राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित महाकाव्य ‘साकेत’ के नवम सर्ग से लिया गया है। यह गीत उर्मिला की विरह-व्यथा को प्रकट करता है।

चरण 2: प्रसंग:
लक्ष्मण वन में श्रीराम के साथ हैं और उर्मिला अयोध्या के महल में अकेली है। वसन्त के मादक वातावरण में कामदेव उसे और सताता है। तब वह कामदेव को सम्बोधित करके उससे प्रार्थना करती है कि वह उस पर फूलों के बाण न चलाए।

अंतिम उत्तर:
सन्दर्भ: मैथिलीशरण गुप्त, ‘साकेत’ (नवम सर्ग), उर्मिला का कामदेव से विनय।
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