दिए गए पद्यांश (चींटी) पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
चींटी को देखा ?
वह सरल, विरल, काली रेखा।
तन के ताले-सी जो हिल-डुल
चलती लघु पद पल्लव मिल-गुल
वह है पिपीलिका पाँति।
देखो वह किस भाँति
काम करती वह सतत !
कण-कण कणके चुनती अविरत !
(i) उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) कवि 'वह है पिपीलिका पाँति' के द्वारा जीवन के किस आदर्श की ओर संकेत करता है?
'रस मीमांसा' के लेखक हैं
'तितली' कृति की विधा है :
डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद लेखक हैं :
'साहित्य और कला' रचना है :
शुक्लोत्तर - युग के लेखक हैं :
दिए गए निर्गुण-सम्बन्धी पद्यांश पर आधारित प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
निरगुण कौन देश को बासी ?
मधुकर कहि समुझाइ साँहि दे, बुढ़ाती साँच न हाँसी।।
को है जनक, कौन है जननी, कौन नारि, को दासी ?
कोहे बरण, भेषहिं के कैसी, किहिं रस मैं अडिगलासी ?
पावोगी पुनि किया आपनो, जो रे करोगे गाँसी।
सुनत मौन है रहयो बावरी, सूर सबै मति नासी।।
(i) उपर्युक्त पद्यांश का सन्दर्भ लिखिए।
(ii) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
(iii) निर्गुण ब्रह्म के वर्णन में क्या कठिनाई व्यक्त की है?
दिए गए पद्यांश पर आधारित तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
अतुलनीय जिसके प्रताप का
साक्षी है प्रत्यक्ष दिवाकर।
घूम-घूम कर देख चुका है
जिनकी निर्मल कीर्ति निशाकर॥
देख चुके हैं जिनका वैभव
ये नभ के अनन्त तारागण।
अगणित बार सुन चुका है नभ
जिनका विजय घोष रण गर्जन॥
दिए गए पद्यांश पर आधारित तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए:
ऊधौ मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं।
वृन्दावन गोकुल बन उपवन, सघन कुंज की छाँही।
प्रात समय माता जसुमति अरु नंद देखि सुख पावत।
माखन रोटी दधयो सजायौ, अति हित साथ खाववत॥
गोपी ग्वाल बाल संग खेलत, सब दिन हँसत सिरात।
सूरदास धनि-धनि ब्रजवासी, जिनसों हित जडु-तात॥
निम्नलिखित पद्यांश पर आधारित दिए गए तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
सहे वार पर वार अन्त तक,
लड़ी वीर बाला-सी।
आहुति-सी गिर चढ़ी चिता पर,
चमक उठी ज्वाला-सी॥
बढ़ जाता है मान वीर का,
रण में बलि होने से।
मूल्यवती होती सोने की,
भस्म यथा सोने से॥
निम्नलिखित पद्यांश पर आधारित दिए गए तीन प्रश्नों के उत्तर दीजिए :
खिलकत कान्ह घुटरुवनि आवत।
मणिमय कनक नंद के आँगन, बिंब पकरीहिं धावत॥
कबहुँ निरिखि हरि आपु छाँड़ि कौं, कर सौँ पकरन चाहत।
किलकि हँसत रजत दूवे दतियाँ, पुनि पुनि तिहिं अवगाहत॥
कनक-भूमि पर कर-पग छाया, यह उपमा इक राजति।
कारी-कारी प्रतिपद प्रतिमनि बसुधा, कमल बैठकी साजति॥
बाल-दसा-सुख निरिखि जसोदा, पुनि-पुनि नंद बुलावति।
अँचरा तर लै ठाँकि, सूर के प्रभु को दूध पियावति॥