Question:

‘अतिथि देवो भव’ की भावना का साकार रूप लेखक को यास्सेर अराफ़ात के आतिथ्य सत्कार में कैसे दिखाई दिया? 
 

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अतिथि-सत्कार की गरिमा तब बढ़ती है जब वह केवल परंपरा नहीं, आत्मा से किया गया व्यवहार हो।
Updated On: Jan 14, 2026
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Solution and Explanation

‘गाँधी, नेहरू और यास्सेर अराफ़ात’ पाठ में लेखक ने यास्सेर अराफ़ात की सादगी, संवेदनशीलता और अतिथि-सत्कार की भावना का हृदयस्पर्शी चित्र प्रस्तुत किया है। ‘अतिथि देवो भव’ — अर्थात अतिथि को देवता मानने की भावना — केवल भारतीय संस्कृति तक सीमित नहीं, बल्कि यास्सेर जैसे वैश्विक नेता के व्यवहार में भी दिखाई देती है।
प्रमुख संकेत: (1) लेखक को यह देखकर आश्चर्य होता है कि एक बड़ा नेता स्वयं अपने मेहमान का स्वागत करता है।
(2) उसने लेखक को व्यक्तिगत आदर दिया, औपचारिकता के बजाय आत्मीयता दिखाई।
(3) बिना भेदभाव के मुस्कराकर हाथ मिलाया — जिससे लेखक को यह महसूस हुआ कि वह एक परिवारिक सदस्य के समान स्वागत पा रहे हैं।
(4) यास्सेर का व्यवहार भारतीय परंपरा से मेल खाता है — वह राजनयिक नहीं, आत्मीय था।
निष्कर्ष: लेखक को यास्सेर अराफ़ात में ‘अतिथि देवो भव’ का व्यवहारिक उदाहरण मिला — यह दिखाता है कि जब भावना सच्ची हो, तो संस्कृति और भाषा की सीमाएँ समाप्त हो जाती हैं।
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