Question:

नाटक और रंगमंच जैसी विधा का सृजन मूलतः अस्वीकृति के भीतर से ही होता है। उदाहरण सहित सिद्ध कीजिए।
 

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रंगमंच वह स्पंदन है जो समाज की पीड़ाओं को आवाज़ देता है — अस्वीकार के भीतर से क्रांति उपजाता है।
Updated On: Jul 18, 2025
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Solution and Explanation

नाटक और रंगमंच साहित्य की वह विधा हैं जो केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद का माध्यम भी हैं।
इनका सृजन तब होता है जब लेखक समाज की किसी विसंगति, अन्याय या पीड़ा को स्वीकार नहीं करता।
यानी यह 'अस्वीकृति' उस रचनात्मकता का मूल है।
मोहन राकेश के ‘आधे-अधूरे’ या विजय तेंडुलकर के ‘घासीराम कोतवाल’ जैसे नाटक इस तथ्य को सिद्ध करते हैं।
इनमें पात्रों के भीतर व्याप्त असंतोष, विद्रोह और संघर्ष को मंच के माध्यम से प्रकट किया गया है।
जब समाज मौन हो, तब रंगमंच बोलता है — और यह बोलना उस अस्वीकार की अभिव्यक्ति है, जिससे लेखक व्यथित होता है।
रंगमंच सामाजिक बदलाव की चेतना को जगाने का माध्यम बन जाता है।
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