Question:

निम्नलिखित प्रश्नों को ध्यानपूर्वक पढ़कर किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर लगभग 60 शब्दों में लिखिए :

‘कैमरे में बंद अपाहिज’ कविता से उद्धृत पंक्ति ‘परदे पर वक़्त की कीमत है’ – में निहित व्यंग्य को स्पष्ट कीजिए।

Show Hint

संचालक को समय और कार्यक्रम की सफलता की चिंता है, अपाहिज की पीड़ा की नहीं। यही व्यंग्य है।
Updated On: Oct 27, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: प्रसंग:
‘कैमरे में बंद अपाहिज’ रघुवीर सहाय की कविता है। इसमें दूरदर्शन का एक संचालक कैमरे के सामने एक अपाहिज व्यक्ति से उसकी अपंगता के बारे में बार-बार प्रश्न पूछता है। उसका लक्ष्य है कि वह व्यक्ति परदे पर रो पड़े और दर्शक भी भावुक हो जाएँ।

चरण 2: पंक्ति कहाँ आती है:
जब बहुत कोशिश के बाद भी अपाहिज नहीं रोता, तब कोष्ठक में संचालक के शब्द आते हैं: ‘कैमरा बस करो, नहीं हुआ, रहने दो, परदे पर वक़्त की कीमत है।’ अर्थात प्रसारण का हर क्षण महँगा है, इसलिए असफल दृश्य पर और समय नहीं गँवाया जा सकता।

चरण 3: निहित व्यंग्य:
संचालक को अपाहिज के दुख से कोई सच्ची सहानुभूति नहीं है। उसके लिए समय, कार्यक्रम की सफलता और लाभ अधिक कीमती हैं। जैसे ही रोने का दृश्य नहीं मिलता, वह व्यक्ति उसके लिए बेकार हो जाता है। कवि मीडिया की इसी व्यावसायिकता और संवेदनहीनता पर चोट करता है।

चरण 4: लगभग 60 शब्दों का आदर्श उत्तर:
इस पंक्ति में मीडिया की व्यावसायिक सोच पर व्यंग्य है। संचालक अपाहिज को रुलाकर कार्यक्रम को मार्मिक बनाना चाहता था। जब वह नहीं रोया, तो उसने कैमरा बंद करवा दिया, क्योंकि परदे का समय महँगा है। उसके लिए मनुष्य की पीड़ा का कोई मूल्य नहीं, केवल समय और कार्यक्रम की सफलता का मूल्य है। यह दूसरों के दुख को बेचने वाली संवेदनहीनता है।

अंतिम उत्तर:
पंक्ति का व्यंग्य यह है कि मीडिया के लिए परदे का समय कीमती है, पर पीड़ित मनुष्य की भावनाएँ नहीं।
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