Question:

निम्नलिखित प्रश्नों को ध्यानपूर्वक पढ़कर किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर लगभग 60 शब्दों में लिखिए :

काले मेघों के झमाझम बरसने पर भी गगरी फूटी की फूटी और बैल प्यासे के प्यासे क्यों रह जाते हैं ? ‘काले मेघा पानी दे’ पाठ के आधार पर लिखिए।

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पाठ के अंत में लेखक कहते हैं: माँगें बड़ी हैं पर त्याग का नाम-निशान नहीं, स्वार्थ ही लक्ष्य है और हम स्वयं भ्रष्टाचार के अंग बन रहे हैं।
Updated On: Oct 27, 2026
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Solution and Explanation

चरण 1: प्रसंग :
‘काले मेघा पानी दे’ धर्मवीर भारती का संस्मरण है। बचपन में इंदर सेना पानी माँगते हुए ‘गगरी फूटी बैल पियासा’ जैसी पंक्तियाँ गाती थी। जीजी ने लेखक को समझाया था कि बिना त्याग के दान नहीं होता, पहले खुद दो तब देवता चौगुना-अठगुना लौटाते हैं, और ‘यथा प्रजा तथा राजा’ भी सच है। पाठ के अंत में लेखक इन्हीं बातों को आज के देश से जोड़ते हैं।

चरण 2: लेखक का विचार :
लेखक कहते हैं कि हम आज देश के लिए करते क्या हैं? माँगें हर क्षेत्र में बड़ी-बड़ी हैं, पर त्याग का कहीं नाम-निशान नहीं। अपना स्वार्थ ही एकमात्र लक्ष्य रह गया है। हम चटखारे लेकर दूसरों के भ्रष्टाचार की बातें करते हैं, पर यह नहीं जाँचते कि अपने स्तर पर हम भी उसी भ्रष्टाचार के अंग तो नहीं बन रहे।

चरण 3: गगरी और बैल का अर्थ :
इसी कारण काले मेघा दल के दल उमड़ते हैं, पानी झमाझम बरसता है, फिर भी गगरी फूटी की फूटी रह जाती है और बैल प्यासे के प्यासे रह जाते हैं। यानी संसाधन और अवसर आते हैं, पर त्याग के अभाव, स्वार्थ और भ्रष्टाचार के कारण उनका लाभ ज़रूरतमंदों तक नहीं पहुँचता।

चरण 4: लगभग 60 शब्दों का उत्तर :
लेखक के अनुसार आज हम देश से बड़ी-बड़ी माँगें करते हैं, पर त्याग नहीं करते। स्वार्थ ही हमारा लक्ष्य बन गया है और हम दूसरों के भ्रष्टाचार की चर्चा करते हुए अपने भ्रष्टाचार को नहीं देखते। इसलिए मेघ झमाझम बरसने पर भी, यानी साधन मिलने पर भी, गगरी फूटी रहती है और बैल प्यासे रहते हैं।

अंतिम उत्तर:
त्याग के अभाव, स्वार्थ और हर स्तर पर फैले भ्रष्टाचार के कारण वर्षा जैसे साधनों का लाभ ज़रूरतमंदों तक नहीं पहुँचता।
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