अपठित गद्यांश: हमारी सांस्कृतिक अस्मिता का ह्रास तो हो ही रहा है, हम लक्ष्य भ्रम से भी पीड़ित हैं। विकास के विराट उद्देश्य से पीछे हट रहे हैं, हम झूठी तुष्टि के तात्कालिक लक्ष्यों का पीछा कर रहे हैं। मर्यादायें टूट रही हैं। नैतिक मानदण्ड ढीले पड़ रहे हैं। व्यक्ति केन्द्रिकता बढ़ रही है। स्वार्थ परमार्थ पर हावी हो रहा है। भोग की आकांक्षाएँ आसमान को छू रही हैं। उपभोक्ता संस्कृति हमारी सामाजिक नींव को हिला रही है।
(ii) उपभोक्ता संस्कृति का अर्थ स्पष्ट कीजिए।