चरण 1: रूपरेखा:
1. प्रस्तावना
2. वसुधैव कुटुम्बकम् का अर्थ और स्रोत
3. भारतीय संस्कृति में यह भावना
4. वर्तमान युग में प्रासंगिकता
5. इस भावना के मार्ग की बाधाएँ
6. उपसंहार
चरण 2: निबन्ध:
प्रस्तावना: भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता उसकी उदारता और विश्व-बंधुत्व की भावना है। हमारे ऋषियों ने केवल अपने देश या समाज के सुख की कामना नहीं की, बल्कि सारे संसार के कल्याण की प्रार्थना की। इसी उदात्त भावना को वसुधैव कुटुम्बकम् कहा गया है।
अर्थ और स्रोत: इसका अर्थ है कि सारी पृथ्वी ही एक परिवार है। यह उक्ति महोपनिषद् और हितोपदेश में मिलती है: अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥ अर्थात यह अपना है और यह पराया है, ऐसा विचार छोटे मन वालों का होता है। उदार हृदय वालों के लिए तो सारी पृथ्वी ही परिवार है।
भारतीय संस्कृति में यह भावना: हमारे यहाँ सर्वे भवन्तु सुखिनः की प्रार्थना की जाती है। अतिथि को देवता माना जाता है। भारत ने शक, हूण, पारसी और अनेक जातियों को शरण दी और उन्हें अपने समाज में घुला-मिला लिया। महात्मा बुद्ध की करुणा, गांधीजी की अहिंसा और स्वामी विवेकानन्द का शिकागो का सम्बोधन इसी भावना के उदाहरण हैं।
वर्तमान युग में प्रासंगिकता: आज विज्ञान और संचार साधनों ने दुनिया को बहुत छोटा कर दिया है। एक देश की आर्थिक मंदी, महामारी या जलवायु संकट का असर सब पर पड़ता है। कोरोना काल में भारत ने अनेक देशों को दवाइयाँ और टीके पहुँचाए। भारत की अध्यक्षता में हुए जी-20 सम्मेलन का विषय भी वसुधैव कुटुम्बकम् : एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य रखा गया। परमाणु हथियारों की होड़ और आतंकवाद के खतरे के बीच शांति का मार्ग यही भावना दिखाती है।
बाधाएँ: स्वार्थ, संकीर्ण राष्ट्रवाद, धर्म और जाति के भेद, आतंकवाद तथा शक्तिशाली देशों की विस्तारवादी नीति इस भावना के मार्ग की बड़ी रुकावटें हैं।
उपसंहार: यदि हम अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर दूसरों के सुख-दुख को अपना समझें, तो युद्ध, घृणा और शोषण समाप्त हो सकते हैं। विश्व शांति का सच्चा आधार वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना ही है।
निष्कर्ष:
सारा संसार एक परिवार है, इस भाव को अपनाने से ही मानवता सुरक्षित रहेगी।