Question:

शिवालिक की सूखी नीसर पहाड़ियों पर मुस्कुराते हुए ये वृक्ष खड़ेताली हैं, अलमस्त हैं~। 
मैं किसी का नाम नहीं जानता, कुल नहीं जानता, शील नहीं जानता पर लगता है, 
ये जैसे मुझे अनादि काल से जानते हैं~। 
इनमें से एक छोटा-सा, बहुत ही भोला पेड़ है, पत्ते छोटे भी हैं, बड़े भी हैं~। 
फूलों से तो ऐसा लगता है कि कुछ पूछते रहते हैं~। 
अनजाने की आदत है, मुस्कुराना जान पड़ता है~। 
मन ही मन ऐसा लगता है कि क्या मुझे भी इन्हें पहचानता~? 
पहचानता तो हूँ, अथवा वहम है~। 
लगता है, बहुत बार देख चुका हूँ~। 
पहचानता हूँ~। 
उजाले के साथ, मुझे उसकी छाया पहचानती है~। 
नाम भूल जाता हूँ~। 
प्रायः भूल जाता हूँ~। 
रूप देखकर सोच: पहचान जाता हूँ, नाम नहीं आता~। 
पर नाम ऐसा है कि जब वह पेड़ के पहले ही हाज़िर हो ले जाए तब तक का रूप की पहचान अपूर्ण रह जाती है।

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‘पहचान’ और ‘जानना’ दो अलग भाव हैं — उत्तर में इनके बीच का अंतर स्पष्ट करें; यही लेखक का मूल संदेश है।
Updated On: Jan 14, 2026
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Solution and Explanation

सन्दर्भ:
यह गद्यांश एक दार्शनिक और आत्ममंथन से भरा हुआ चित्र है जिसमें लेखक शिवालिक की पहाड़ियों पर खड़े अनाम वृक्षों के माध्यम से व्यक्ति की पहचान और उसकी सीमाओं की बात करता है। यह प्रकृति के माध्यम से आत्मबोध का मार्ग प्रशस्त करता है।
प्रसंग:
लेखक पहाड़ियों पर उगे ऐसे वृक्षों को देखता है जिनके न तो नाम पता हैं, न जात-पाँत, न कुल-शील। फिर भी वे वहाँ खड़े हैं — अस्तित्व में हैं। लेखक उनके अस्तित्व से अपनी पहचान की जटिलता की तुलना करता है।
व्याख्या:
लेखक कहता है — मैं इन वृक्षों का कुछ नहीं जानता — न नाम, न कुल, न गुण — जैसे कोई मुझे अनादि काल से जानता हो।
वह एक छोटा-सा पेड़ देखता है, जिसका न कोई नाम है, न पहचान — फिर भी वह मुस्कुराता है।
यह दृश्य लेखक को झकझोरता है — क्या पहचान का आधार नाम और रूप ही है?
लेखक इस द्वंद्व को स्वीकार करता है — वह कहता है कि पहचानने का अर्थ केवल जानना नहीं होता, पहचानने का अर्थ है “पहचान पाना”।
नाम और रूप मिलने से पहले जो अनुभूति आती है — वही असली पहचान होती है। यह एक आध्यात्मिक और गूढ़ भाव है कि कभी-कभी हम कुछ को बिना जाने भी पहचान लेते हैं।
यह गद्यांश बाह्य जानकारी और आंतरिक बोध के भेद को स्पष्ट करता है।
निष्कर्ष:
यह गद्यांश दर्शन, आत्मबोध और पहचान की प्रक्रिया पर आधारित है। लेखक ने प्रकृति के माध्यम से गहन विचार प्रकट किया है कि नाम, वंश और विशेषता से परे भी पहचान संभव है — जब हृदय स्वतः कहे — “मैं जानता हूँ इसे”।
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